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बुधवार, 25 सितंबर 2013

बहिष्कार भी समर्थन की तरह एक राजनीतिक हथियार है : सन्दर्भ हंस का सम्पादकीय

यह लेख भोपाल की एक पत्रिका के कहने पर लिखा गया था. छपा या नहीं छपा यह पता नहीं, क्योंकि कोई सूचना नहीं आई. अब इस महीने का हंस का सम्पादकीय पढने के बाद इसे यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ.
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हंस और विवादों का रिश्ता नया नहीं है. पत्रिका में लिखे को लेकर तो कभी पत्रिका के बाहर राजेन्द्र जी और उनकी मंडली के कारनामों पर विवाद होते ही रहे हैं. इस बार यह विवाद प्रेमचंद जयंती पर हंस के वार्षिक आयोजन को लेकर है. इस आयोजन में गोविन्दाचार्य, अशोक वाजपेयी, अरुंधती राय और वरवरराव के आने तथा ‘अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता’ विषयक व्याख्यानमाला में उनकी हिस्सेदारी की सूचना थी. लेकिन कार्यक्रम में अरुंधती नहीं आईं और वरवर राव ने दिल्ली आने के बाद भी कार्यक्रम में हिस्सेदारी से इंकार कर दिया. उनके बहिष्कार को लेकर सवाल उठने शुरू हुए तो उन्होंने इंटरनेट पर एक पत्र ज़ारी किया और फिर हिंदी के साहित्यिक विवादों के ‘प्रसंस्करण केंद्र’ जनसत्ता में इसे लेकर उनकी लानत-मलामत करता हुआ एक सम्पादकीय और अपूर्वानंद की एक टिप्पणी प्रकाशित हुई, जिसके उत्तर में उन्होंने एक और पत्र ज़ारी किया. संभव है आगे और वाद-प्रतिवाद आयें. फेसबुक और सोशल मीडिया पर अशोक वाजपेयी कैम्प के तमाम स्वनामधन्य साहित्यकार और जनसत्ता सम्पादक ओम थानवी तो लगातार तलवारें भांज ही रहे हैं.

देखना होगा कि वरवरराव या अरुंधति के हंस के इस सालाना उत्सव में न आने के क्या मानी हो सकते हैं? यहाँ यह याद दिला देना भी बेहतर होगा कि इसके पहले छत्तीसगढ़ के तत्कालीन पुलिस प्रमुख विश्वरंजन और महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति विभूति नारायण राय की उपस्थिति के कारण अरुंधती ने पहले भी हंस के ही एक आयोजन का बहिष्कार किया था. उसकी वजूहात क्या थीं? ज़ाहिर है कि छत्तीसगढ़ में जिस तरह सलवा जुडूम के नाम पर राज्य दमन ज़ारी था (जो अब भी एक भिन्न रूप में रुका तो नहीं ही है) उसकी अगुवाई कर रहे व्यक्ति के साथ मंच शेयर करना आदिवासियों के दमन के खिलाफ लगातार लिख रही अरुंधती ने उचित नहीं समझा था. मुझे नहीं याद कि उसे लेकर तब किसी तरह का कोई विवाद मचा था. आज लोकतंत्र और आवाजाही के सिद्धांत पेश कर रहे लोग तब शायद इसलिए भी चुप थे कि अशोक वाजपेयी खुद विश्वरंजन और विभूति नारायण राय के बहिष्कार (छिनाल प्रकरण के बाद) में शामिल थे. मजेदार बात यह है कि तब वर्धा विश्विद्यालय और छतीसगढ़ के प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान (जिसके सर्वे सर्वा विश्वरंजन थे) के  बहिष्कार को सही बताने वाले और उसमें शामिल होने वाले लोग आज बहिष्कार की पूरी अवधारणा पर प्रश्न खड़े कर रहे हैं और इसे ‘लोकतांत्रिक मूल्यों’ के ख़िलाफ़ बता रहे हैं. ओम थानवी सवाल उठाते हैं कि ‘अगर ‘लोकतंत्र में सभी मंच एकतान हो गए तो जिस वैचारिक और सांस्कृतिक बहुलता को हम अपने लोकतंत्र का असली आधार मानते हैं, वह समाप्त हो जायेगी’ तो अपूर्वानंद कहते हैं ‘भारत में, जो अब भी एक-दूसरे से बिलकुल असंगत विचारधाराओं और विचारों के तनावपूर्ण सहअस्तित्व वाला देश है , किसी विचार को चाह कर भी सार्वजनिक दायरे से अपवर्जित करना संभव नहीं है.’ सवाल वही है कि यह लोकतंत्र ‘वर्धा’ या ‘प्रमोद स्मृति संस्थान’ में लागू क्यों नहीं होता है? क्यों यह थानवी साहब के अखबार में अपने विरोधियों के प्रतिवाद को स्थान देने के क्रम में लागू नहीं होता? (सी आई ए को लेकर लम्बे चले विवाद में थानवी ने वीरेन्द्र यादव, मेरे या गिरिराज किराडू के प्रतिवाद छापने से शब्द सीमा निर्धारण के नाम पर इंकार कर दिया था) 

सवाल यहाँ यह भी है कि वाकई हंस कोई ऐसा आयोजन कर रहा था जिसमें किसी बहस-मुबाहिसे की गुंजाइश थी? ज़ाहिर है कि यह कोई पैनल डिस्कशन या परिचर्चा नहीं, व्याख्यानमाला थी. इस व्याख्यानमाला में सबको अपने-अपने भाषण देने थे और किसी तरह की बहस की कोई गुंजाइश नहीं थी. ऐसे में यह तर्क कि वहां वैचारिक विरोधियों से बहस की जानी चाहिए थी, बिना नींव का है. साम्प्रदायिकता के धुर विरोधी अशोक वाजपेयी ने वहाँ कट्टर साम्प्रदायिक गोविन्दाचार्य से क्या बहस की? फिर यह हंस का आयोजन था जिसे आमतौर पर एक वामपंथी मैगजीन की तरह जाना जाता रहा है. उसके उत्सव में एक धुर वामपंथ विरोधी बुर्जुआ और एक कट्टर साम्प्रदायिक को मंच पर क्यों होना चाहिए था? और अगर उत्सव में वे शामिल थे तो फिर वहां एक घोषित नक्सलवादी वामपंथी वरवरराव और आदिवासी अधिकारों की प्रवक्ता तथा कार्पोरेट विरोधी अरुंधती राय को क्यों होना चाहिए था? संसद में सबके साथ बैठने का उदाहरण देने वाले बताएँगे कि कौन सी पार्टी अपने घरेलू समारोहों में विपरीत विचारधारा के लोगों को बुलाती है? कब ऐसा होता है कि कांग्रेस के किसी समारोह में मुख्य वक्ता भाजपा या कम्युनिस्ट पार्टी का होता है? समारोह के मंच के भागीदार आपके वैचारिक हमसफ़रों की घोषणा होते हैं. ज़ाहिर है हंस अपने मंच पर इन लोगों को बुलाकर कुछ और साबित करना चाहता था तो फिर किसी वरवर राव को उससे खुद को अलग करने का हक क्यों न हो? क्या भारत और विश्व के साहित्यिक परिदृश्य में बहिष्कार पहले नहीं हुए हैं? क्या सार्त्र ने नोबेल का बहिष्कार नहीं किया था? क्या एक समय में अज्ञेय ने भारत भवन का बहिष्कार नहीं किया था? क्या अरुंधती ने साहित्य अकादमी नहीं ठुकराया? क्या फोर्ड फाउंडेशन जैसे स्रोतों का लम्बे समय तक (और अब भी) तमाम जनपक्षधर साहित्यकारों और कलाकारों ने बहिष्कार नहीं किया? क्या अमेरिका ने चार्ली चैपलिन जैसे कलाकार को देशनिकाला नहीं दिया? क्या ब्रेख्त को अमेरिकी साम्राज्यवाद और हिटलर के फासीवाद के विरोह की क़ीमतें तमाम देशों से दर-ब-दर होकर नहीं चुकानी पड़ीं? और क्या आज लोकतंत्र की दुहाई दे रहे वाजपेयी कैम्प ने अपने किसी आयोजन में वरवर राव या ग़दर जैसे कलाकारों को बुलाया? क्या यह एक तरह का अघोषित बहिष्कार नहीं था/ है? फिर वरवर राव अगर साम्प्रदायिक गोविन्दाचार्य और वाम विरोधी अशोक वाजपेयी के साथ एक समारोह में मंच शेयर नहीं करना चाहते तो इतनी चिल्ल-पों क्यों? बहिष्कार भी समर्थन की तरह एक राजनीतिक हथियार है और एक लेखक को इसके प्रयोग का पूरा अधिकार है. 

वरवर राव अशोक वाजपेयी को कारपोरेट कल्चर का समर्थक कहते हैं और इस रूप में अपना वैचारिक विरोधी कहते हैं. इसे लेकर बहुत शोरगुल मचाया गया और अशोक वाजपेयी के सेकुलर होने का उदाहरण पेश किया गया. सवाल यह है कि कौन उनके सेकुलर होने पर सवाल खड़ा कर रहा है? लेकिन बुर्जुआ वर्ग सेकुलर होता ही है, इससे उसका कारपोरेट विरोधी हो जाना तो सिद्ध नहीं होता? आखिर कांग्रेस, सपा, बसपा जैसी सभी पार्टियां ही नहीं हमारी फिल्म इंडस्ट्री के तमाम कलाकार और कारपोरेट भी धर्मनिरपेक्षता का दावा करते हैं और उनमें से काफी हैं भी. एक दौर में राजनीति में कारपोरेट कल्चर के सबसे बड़े प्रतिनिधि के रूप में उभरे अमर सिंह तो उस नरेंद्र मोदी के बेहद कटु आलोचक रहे जिसके खिलाफ लेखकों को इकट्ठा करने के वाजपेयी जी के प्रयास को रेखांकित कर उनके आलोचकों पर सवाल उठाये जा रहे हैं. साफ है कि साम्प्रदायिकता का विरोध और कारपोरेट का विरोध दो अलग-अलग चीजें हैं. अशोक वाजपेयी का पूरा लेखन और जीवन सबके सामने है और अगर उसमें कारपोरेट कल्चर या पूंजीवाद का विरोध नहीं है तो वरवर राव को उसे रेखांकित करने और उसके आधार पर उन्हें अपना वैचारिक शत्रु घोषित करने का हक है. लगातार शासन और निजी तंत्र के गठजोड़ के हाथों उत्पीडन और दमन झेल रहे लोगों के साथ सक्रिय वरवर राव का नज़रिया आई आई सी और हैबिटाट में बैठकर साहित्यिक षड्यंत्र रचने और पद-पुरस्कार-फेलोशिप-यात्रा की जुगाड़ में लगे लोगों से अलग तो होना ही है.
इस देश के लोकतंत्र और फिर उसमें  ‘बिलकुल असंगत विचारधाराओं और विचारों के तनावपूर्ण सहअस्तित्व’ की बात करने वाले लोग वरवर राव की विचारधारा के साथ सत्ता और उसके प्रतिनिधि साहित्यकारों के सुलूक को किस आसानी से भुला देते हैं. क्या सच में तनावपूर्ण ही सही, उस विचारधारा को किसी तरह का सह अस्तित्व मयस्सर होता है इस लोकतंत्र में? क्या उनके प्रति किसी तरह की कोई सहानूभूति या समानुभूति सत्ता और उसके प्रतिनिधि लेखकों-संपादकों के यहाँ दिखती है? अगर नहीं तो उनसे यह उम्मीद क्यों? और क्या यह सच नहीं है कि क्रांतिकारी वामपंथ के अलावा इस ‘बहुलता वादी’ देश के सभी वैचारिक समूह कारपोरेट लूट के मसले पर नव आर्थिक उदारवाद की विचारधारा के साथ ‘एकतान’ हो चुके हैं और यह सेकुलर और साम्प्रदायिक दोनों विचारों की प्रतिनिधि राजनीतिक संरचनाओं की सामान आर्थिक नीतियों के परिप्रेक्ष्य में स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है.

दरअसल लोकतंत्र की यह दुहाई अक्सर अपने दमनकारी विचारों और अवसरवाद को लोक मानस में स्वीकार्यता दिलाने के लिए दी जाती है. इसका एक उदाहरण हंस से ही. जब हंस ने उत्तराखंड के तत्कालीन मुख्यमंत्री की एक कहानी हंस में छापी तब ऐसे ही एक सालाना आयोजन में एक युवा पाठक के सवाल उठाने पर राजेन्द्र जी लोकतंत्र की ही दुहाई देते हुए कहानी के छपने का औचित्य साबित किया. खैर..मुख्यमंत्री महोदय ने मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद कोई ऐसी कहानी नहीं लिखी शायद जिसे अपने भरपूर लोकतंत्र के बावजूद राजेन्द्र जी हंस में छाप पाते!   


रविवार, 31 अक्टूबर 2010

अरुंधती कश्मीर क्यूं नहीं जातीं?

(अरुंधती का ताज़ा बयान विवादों के घेरे में है…इस बहाने तमाम लोग मार्क्सवाद को गरिया रहे हैं…अरुंधती को ज़ेल भेजने की बात कर रहे हैं और फेसबुक आदि पर अपनी 'देशभक्ति' का जांबाज प्रदर्शन कर रहे हैं…यहां हम स्तंभकार अंशुमाली रस्तोगी का बयान इस वीर-बालक मुद्रा के प्रतिनिधि के रूप में दे रहे हैं…यह बयान पढ़कर आप इस वीरता प्रदर्शन के स्रोत जान सकते हैं…मज़ेदार बात यह है कि अंशुमाली अरुंधती को कश्मीर जाने की सलाह दे रहे हैं…मानों ये सब वीर सीधे ग्राउण्ड ज़ीरो से कमेन्ट्री कर रहे हैं…जबकि उन्हें यह भी नहीं पता कि अरुंधती ने वहां से लौटने के बाद भी एक बयान दिया है…हम अरुंधती का बयान और उनके दिल्ली में दिये गये बयान पर वरवर राव के बयान का एक हिस्सा हाशिया से साभार लगा रहे हैं…आप सब इस बहस में आमंत्रित हैं। )


अरुंधति रॉय की घोषित प्रगतिशीलता के मायने
अंशुमाली रस्तोगी

मार्क्सवादी अरुंधति रॉय की बहुत तारीफ करते हैं। उन्हें अपने भगवान का सा दर्जा देते हैं। उनकी निगाह में अरुंधति बेहद तरक्की-पसंद लेखिका हैं। अरुंधति जो लिख व कह देती हैं उनके लिए वो 'पत्थर की लकीर' सा हो जाता है। मेरे विचार में अभी हाल अरुंधति ने भारत-विरोधी जो बयान दिया है उसे भी मार्क्सवादी प्रगतिशीलों ने 'पत्थर की लकीर' ही माना होगा!जिस कश्मीर के लिए इतने लंबे समय से संघर्ष चल रहा है, जिस संघर्ष के बीच न जाने कितने लोग शहीद हो चुके हैं, न जाने कितने बेघर उनके संघर्ष और शाहादत को अरुंधति ने एक पल में अपने बयान से 'ध्वस्त' करके रख दिया। बड़े ही प्रगतिशील अंदाज में उन्होंने कह दिया कि कश्मीर भारत का अंग है ही नहीं। कश्मीर के बहाने भारत को देखने की उनकी निगाह को अगर 'राष्ट्र-विरोधी' नहीं माना जाए तो क्या माना जाए!

यह सही बात है कि अपने देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दायरा बहुत बड़ा है लेकिन इतना भी बड़ा नहीं है कि आप उस दायरे को ही तोड़ने लग जाएं। जब कश्मीर के प्रति अरुंधति का यह रूख है तो ऐसा ही कुछ कभी वो भारत की स्वतंत्रता के खिलाफ भी कह-लिख सकती हैं। हम देख चुके हैं कि पिछले दिनों वे माओवादियों के संघर्ष को जायज ठहरा ही चुकी हैं। और माओवादियों के प्रति अपने दिल में 'खास हमदर्दी' भी रखती हैं। उन्हें शायद उस पीड़ा का एहसास है ही नहीं जो शहीदों के परिवारों को माओवादियों के अत्याचारों से मिला है। माओवादी देश के भीतर एक नए तरह के आतंकवाद को रचने की तैयारियों में संलग्न हैं, जिसे अरुंधति अपना नैतिक व वैचारिक समर्थन देती हैं। वाह! अपने ही देश में रहकर उसके खिलाफ कुछ भी बोल देना क्या अरुंधति की महान प्रगतिशीलता ने उन्हें यही सिखाया है?

साथ ही इस मामले में यह देखना भी बेहद दिलचस्प है कि अरुंधति के ऐसे बेतुके बयान पर प्रगतिशील मार्क्सवादी अपनी जुबानें खामोश रखे हुए हैं। मतलब साफ है कि अरुंधति को उनका मन ही मन मौन समर्थन हासिल है। अरुंधति के माओवादी-प्रेम पर भी प्रगतिशील उनके पक्ष में उतर आए थे। अरुंधति को 'प्रगतिशीलता की देवी' बनाने के लिए उन्होंने क्या नहीं कहा-लिखा था। यह मान लेने में कोई शक नहीं कि प्रगतिशील अपनी छद्म प्रगतिशीलता को स्थापित रखने के लिए किसी भी हद से गुजर सकते हैं। फिर चाहे वो कश्मीर को भारत से अलग कर दें या गुजरात को। उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।

इतनी भोली अरुंधति भी न होंगी कि उन्हें मालूम ही न हो कि कश्मीर की रंगत को बिगाड़ने में किन अलगाववादियों और किस देश का हाथ रहा है। क्या उन्हें कश्मीरी पंडितों के विस्थापन और उनकी तकलीफों का एहसास है? कश्मीर की अवाम किस तरह से हर पल खतरों के साये में अपनी जिंदगी गुजर बसर कर रही है, क्या अरुंधति इस सच को जानती हैं? माओवादियों के बीच रहकर उनकी वाह वाही का समर्थन हासिल करने वाली अरुंधति प्रयास करें कुछ दिनों कश्मीर में रहने का भी वहां के जो संगीन हालात हैं, उसकी हकीकत उन्हें मालूम चल जाएगी। ठीक है कि आप बहुत उम्दा प्रगतिशील लेखिका हैं, तो अपनी प्रगतिशीलता अपने गुट और अपने हितैषियों के मध्य रखिए न, उसे आप पूरे देश पर क्यों थोपना चाहती हैं?

दरअसल, अरुंधति रॉय जैसे प्रगतिशील जिस वर्ग से आते हैं, उसमें न संवेदना होती है न ही कुछ सोचने-समझने की ताकत। बस,एक जिद्द बनी रहती है कि कैसे भी हमें अपनी प्रगतिशीलता को दूसरे पर थोपना है। अगर सामने वाला उनकी प्रगतिशीलता को सहृय स्वीकार लेता है, तो वो उनकी निगाह में महान है और जो उनसे जरा भी नाइत्तेफाकी रखे वो उनका 'सबसे बड़ा दुश्मन'। यह हम मकबूल फिदा हुसैन के मामले में बेहतर देख व जान चुके हैं।

बहरहाल, अरुंधति के बयान पर हाय-तौबा जारी है। इसके अभी कुछ और दिन जारी रहने की संभावना भी है। मामला पूरी तरह से राजनीतिक रंग ले चुका है। इस पर अलग-अलग तरह के बयानों व कथनों की रोटियां सिकना भी शुरू हो चुकी हैं। पर,बड़ी बात यह है कि देश के प्रति हमारे जो सरोकार व संवेदनाएं होनी चाहिए वो समाप्त हो गई हैं। क्योंकि हम मुद्दों को अपने-अपने फायदे व नुकसान के हिसाब से उठाते हैं और वैसे ही खत्म भी कर देते हैं। शायद अरुंधति के इस बयान का मकसद भी यही रहा हो!
अब देखना यह है कि इस मामले में अरुंधति रॉय की 'घोषित प्रगतिशीलता' की जीत होती है या 'सरकार की सख्ती' की


अरुंधति रॉय का बयान

मैं यह श्रीनगर, कश्मीर से लिख रही हूँ. आज सुबह के अख़बारों ने लिखा है कि मैं कश्मीर पर आयोजित एक आमसभा में कही गयी अपनी बातों के लिए देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार हो सकती हूँ. मैंने वह कहा जो यहाँ दसियों लाख लोग रोज कह रहे हैं. मैंने वही कहा जो दूसरे लेखक सालों से लिखते और कहते आये हैं. मेरे भाषणों को पढने की ज़हमत उठानेवाले यह देखेंगे कि मैंने बुनियादी तौर पर इंसाफ की मांग की है. मैंने कश्मीरी लोगों के लिए इंसाफ के बारे में कहा है जो दुनिया के सबसे क्रूर फौजी कब्ज़े में रह रहे हैं, उन कश्मीरी पंडितों के लिए, जो आपने घरों से उजाड़ दिए जाने की त्रासदी में जी रहे हैं, उन दलित सैनिकों के लिए, कूड़े के ढेर पर बनी कब्रों को मैंने कुड्डालोर में उनके गांवों में देखा, भारत के उन गरीबों के लिए जो इस कब्ज़े की कीमत चुकाते हैं और एक बनते जा रहे पुलिस राज के आतंक में जीना सीख रहे हैं.

कल मैं शोपियां गयी थी- दक्षिणी कश्मीर के सेबों के उस शहर में जो पिछले साल 47 दिनों तक आसिया और नीलोफर के बर्बर बलात्कार और हत्या के विरोध में बंद रहा था. इन दोनों युवतियों की लाशें उनके घरों के पास की एक पतली सी धारा में पाई गयी थी और उनके हत्यारे अब भी क़ानून से बहार हैं. मैं नीलोफर के पति और आसिया के भाई शकील से मिली. मैं वेदना और गुस्से से पागल उन लोगों के साथ एक घेरे में बैठी जो भारत से इंसाफ पाने की उम्मीद को खो चुके हैं, और अब यकीन रखते हैं कि आज़ादी उनकी अकेली उम्मीद है. मैं पत्थर फेंकनेवाले उन नौजवानों से मिली जिनकी आँखों में गोली मारी गयी थी. मैंने एक नौजवान के साथ सफ़र किया, जिसने मुझे बताया कि अनंतनाग जिले के उसके तीन किशोर दोस्त हिरासत में लिए गए और पत्थर फेंकने की सजा के तौर पर उनके नाखून उखाड़ लिए गए.

अख़बारों में कुछ लोगों ने मुझ पर नफ़रत फ़ैलाने और भारत को तोड़ने का आरोप लगाया है. इसके उलट, मैंने जो कहा है उसके पीछे प्यार और गर्व की भावना है. इसके पीछे यह इच्छा है कि लोग मारे न जाएँ, उनका बलात्कार न हो, उन्हें कैद न किया जाये और उन्हें खुद को भारतीय कहने पर मज़बूर करने के लिए उनके नाखून न उखाड़े जाएँ. यह एक ऐसे समाज में रहने की चाहत से पैदा हुआ है जो इंसाफ के लिए जद्दोजहद कर रहा हो. तरस आता है उस देश पर जो लेखकों की आत्मा की आवाज़ को खामोश करता है. तरस आता है उस देश पर जो इंसाफ की मांग करनेवालों को जेल भेजना चाहता है जबकि सांप्रदायिक हत्यारे, जनसंहारों के अपराधी, कार्पोरेट घोटालेबाज, लुटेरे, बलात्कारी और गरीबों के शिकारी खुले घूम रहे हैं.


वरवर राव का बयान

आत्मनिर्णय के अधिकारों का पक्ष लेते हुए राय ने इस पर जोर दिया कि अकेले आज़ादी हर चीज़ नहीं दे सकती: उन्होंने जानना चाहा कि कश्मीरी लोगों को जब आज़ादी मिल जाएगी तो कश्मीरियों को कैसा इंसाफ मिलेगा. उन्होंने कश्मीर के एक दौरे के दौरान सुने गए नारे का हवाला दिया: 'भूखा नंगा हिंदुस्तान, जान से प्यारा पाकिस्तान' और इस नज़रिए पर गंभीर आपत्ति जताई थी. राय ने कहा कश्मीरियों के संघर्ष का समर्थन ठीक इन्हीं (भूखे-नंगे) वर्गों से आ रहा है- बुद्धिजीवियों के एक छोटे से हिस्से के अलावा देश के दूसरे हिस्सों के गरीब और उत्पीड़ित लोग कश्मीरी लोगों कि आज़ादी के संघर्ष को समर्थन दे रहे हैं. उनके संघर्ष का विरोध भारतीय राज्य कर रहा है.