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मंगलवार, 4 मार्च 2014

पूरनचंद जोशी होने के निहितार्थ - वीरेन्द्र यादव.

पूरण चन्द्र जोशी 



लम्बी बीमारी के बाद अभी विगत २ मार्च को प्रख्यात समाजशास्त्री पूरनचंद जोशी का हमारे बीच न रहना साहित्य और समाजशास्त्रीय अनुशासन के बीच की एक महत्वपूर्ण कड़ी का टूट  जाना है .आज से लगभग ढाई दशक पूर्व जब  पूरनचंद जोशी की पुस्तक ‘परिवर्तन और विकास के सांस्कृतिक आयाम’ प्रकाशित हुई थी तो हिन्दी बौद्धिकों के बीच यह एक नयी परिघटना इसलिए थी कि श्यामाचरण दुबे के बाद संभवतः यह पहली बार था कि गैर साहित्यिक अनुशासन  से इतर किसी बुद्धिजीवी ने साहित्य और समाजशास्त्र के अंतर्संबंधों पर हिन्दी साहित्य के साक्ष्य द्वारा अपना विमर्श रचा हो . भारतीय सन्दर्भों में प्रेमचंद के ग्राम केन्द्रित लेखन का विश्लेषण करते हुए उन्होंने भारतीय सामाजिक संरचना को समझने की एक नयी दृष्टि की तलाश का उपक्रम किया था .  स्वाधीनता आन्दोलन के दौर में गांधी और प्रेमचंद के बीच अन्तर्सम्बन्धों की पड़ताल और व्याख्या करते हुए उन्होंने ग्रामीण भारत को इस समूचे देश की चेतना का स्रोत बताया था . दरअसल  जिस ‘लखनऊ स्कूल आफ सोशियालोजी’  में जोशी जी की बौद्धिक निर्मिति हुयी थी वह पश्चिमी दृष्टि को प्रश्नांकित करते हुए आधुनिकता की देशज पहचान की कायल अधिक थी .

        उल्लेखनीय तथ्य यह है कि पूरनचंद  जोशी  वैचारिक रूप से एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी बुद्धिजीवी थे .लेकिन वे मार्क्सवाद को मानव नियति और  सामाजिक रूपांतरण की एक खुली सैधान्तिकी और परिघटना के रूप में देखने समझने के कायल थे . जहाँ वे सोवियत क्रांति को मानव इतिहास में श्रम शक्ति की  केन्द्रीयता  की ऐतिहासिक उपलब्द्धि मानते थे वहीं बाद के दौर में उन्होंने   इसकी  उस रूढिगत  सैधान्तिक परिणति को प्रश्नांकित भी किया जो ‘विवेकवाद’ और ‘बुद्धिवाद’ की कसौटी पर कही कमतर रह जाती थी . अपनी वैचारिकी में जोशी जी  मार्क्सवाद की स्तालिनवादी परिणति को मार्क्सवाद का पर्याय नहीं मानते थे .उनका स्पष्ट कहना था कि  स्टालिन मार्क्सवाद की उस बौद्धिक परम्परा से होकर नहीं गुजरे थे जो तर्क, विवेक और बुद्धिवाद में  रची बसी थी .सोवियत यूंनियन को साम्राज्यवादी दुष्चक्र से बचाने  और क्रांति की उपलब्धियों को संजोये रखने के लिए स्टालिन ने विवेक की जगह जिस आस्था का सहारा लिया उसने  सोवियत माडल को ‘आयरन कर्टेन’ की जिन परिणतियों तक पहुँचाया वही इसके पतन का कारण बना . स्टालिन के बारे में उनका  कहना था कि  स्टालिन ने ईसाई पादरी से कम्युनिस्ट पादरी में व्यक्तित्वांतरण की जो छलांग लगाई वही उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी सीमा थी . लेकिन इसे स्वीकार करते हुए जोशी जी  उन  कम्युनिस्ट विरोधियों  से घोर असहमत थे जो स्टालिनवाद को मार्क्सवाद का पर्याय मानकर समूची मार्क्सवादी सोच को ही ख़ारिज करते थे .

      दरअसल पूरनचंद जोशी मार्क्स  के आर्थिक चिंतन और नए समाज के निर्माण के दर्शन को गांधी, नेहरु ,टैगोर की भारतीय नजर से भी गुजर कर समझने के पक्षधर थे .इसीलिये जहाँ उन्होंने टैगोर और नेहरू के रूसी यात्रा वृतांत के  साक्ष्य   से  नए बनते  सोवियत समाज  की शक्ति और सामर्थ्य को पहचाना वहीं प्रो. ध्रुजती प्रसाद मुख़र्जी और का. आशाराम सरीखों के बयानों के माध्यम से उस समाज की सीमा को भी पह्चानने से कोई गुरेज नहीं किया . उनकी पुस्तक  ‘यादों से रची यात्रा’ एक उदारवादी  कम्युनिस्ट बुद्धिजीवी का ऐसा आत्मवलोकन है जो उस विगत की बेबाक पड़ताल करता है जो एक साथ ‘दिवास्वप्न’ और ‘दुःस्वप्न’ दोनों ही था . वैचारिक संकट की घड़ी में क्या होता है एक प्रतिबद्ध परिवर्तनकामी बुद्धिजीवी होने का अर्थ पूरनचंद जोशी  इस जद्दोजहद से शिद्दत से मुठभेड़ करने में सक्षम थे . वे उन  बुद्धिजीवियों में थे जो न तो सिद्धांत को कवच के रूप में धारण करने के कायल थे और न ही असुविधाजनक  स्थिति में इसे उतार फेंकने के . आज जब नवउदारवाद  का कवच कुंडल धारण करके पूंजीवाद की वैचारिकी से समूचे मार्क्सवाद का आखेट किया जा रहा है तो ऐसे समय में पूरनचंद जोशी का न होना समूचे प्रगतिशील हिन्दी समाज की निश्चित रूप से एक अपूरणीय क्षति है . वे आज के समय में एक नैतिक बौद्धिक उपस्थिति थे . इस हार्दिक स्मरण के साथ  उन्हें अंतिम विदाई .  



                                                

बुधवार, 14 अगस्त 2013

फेसबुक और अभिव्यक्ति का जोखिम - वीरेन्द्र यादव

कँवल भारती की गिरफ़्तारी और उसके बाद अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर लेखकों के प्रतिरोध के क्रम में वीरेन्द्र यादव का यह लेख शुक्रवार के ताज़ा अंक में प्रकाशित है.




फेसबुक पर टिप्पणी लिखने के कारण विगत सप्ताह चर्चित दलित लेखक कँवल भारती की गिरफ्तारी ने जहाँ  सत्ता मद में डूबे राजनेताओं के अहंकार को बेपर्दा  किया है वहीं सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को भी उजागर  किया है . पिछले वर्ष शिवसेना प्रमुख बाला साहब ठाकरे संबंधी  टिप्पणी के कारण मुम्बई में दो छात्राओं की गिरफ्तारी के बाद  फेसबुक टिप्पणी के चलते राजनेताओं की शह पर पुलिसिया कारवाई की यह दूसरी बड़ी घटना है..गनीमत यह है कि दोनों ही घटनाओं में न्यायिक हस्तक्षेप ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा की है . उ.प्र. के रामपुर जिले के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने फेसबुक पर टिप्पणी लिखे जाने को अपराध न मानते हुए कँवल भारती को तुरंत जमानत पर रिहा कर दिया .लेकिन हैरत और चिंता की बात यह है कि उ.प्र.सरकार के जिस बडबोले काबीना मंत्री के समर्थकों के रोष का शिकार कँवल भारती हुए हैं वे  अब पुलिस पर दबाव बनाकर उन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा कानून में गिरफ्तार किये जाने की मांग कर रहे हैं .
     
दरअसल इस पूरे मसले की शुरुवात नोएडा की निलंबित आई ए एस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के पक्ष में बनते जन दबाव का परिणाम है .कँवल भारती ने 4अगस्त को  फेसबुक पर यह टिप्पणी  लिखी  कि , “आरक्षण और दुर्गाशक्ति नागपाल इन दोनों ही मुद्दों पर अखिलेश यादव की समाजवादी सरकार पूरी तरह फेल हो गयी है. अखिलेश, शिवपाल यादव, आज़म खां और मुलायम सिंह (यू.पी. के ये चारों मुख्य मंत्री) इन मुद्दों पर अपनी या अपनी सरकार की पीठ कितनी ही ठोक लें, लेकिन जो हकीकत ये देख नहीं पा रहे हैं, (क्योंकि जनता से पूरी तरह कट गये हैं) वह यह है कि जनता में इनकी थू-थू हो रही है, और लोकतंत्र के लिए जनता इन्हें नाकारा समझ रही है. अपराधियों के हौसले बुलंद हैं और बेलगाम मंत्री इंसान से हैवान बन गये हैं. ये अपने पतन की पट कथा खुद लिख रहे हैं. सत्ता के मद में अंधे हो गये इन लोगों को समझाने का मतलब है भैस के आगे बीन बजाना.''
  
इसके पूर्व 2 अगस्त की टिप्पणी में उन्होंने लिखा था कि ,   “आपका "आज तक" कैसे सबसे तेज है? आपको तो यह ही नहीं पता कि रामपुर में सालों पुराना मदरसा बुलडोजर चलवा कर गिरा दिया गया और संचालक को विरोध करने पर जेल भेज दिया गया जो अभी भी जेल में ही है. अखिलेश की सरकार ने रामपुर में तो किसी भी अधिकारी को सस्पेंड नहीं किया. वह इसलिए कि रामपुर में आज़म खां का राज चलता है, अखिलेश का नहीं. उनको रोकने की मजाल तो खुदा में भी नहीं है”.
        
कँवल भारती रामपुर के ही हैं जहाँ आज़म खां की मर्जी सर्वोपरि है . दुर्गा शक्ति नागपाल के मामले के समानान्तर रामपुर में मदरसा गिराने के सच को उजागर करना ही कँवल भारती की गिरफ्तारी और उत्पीड़न के मूल में है .फेसबुक की प्रकृति और खुलेपन को देखते हुए कँवल भारती की टिप्पणी में अपने जनतांत्रिक मत की अभिव्यक्ति ही की गयी  है . सैकड़ों लोगों ने इस टिप्पणी को ‘लाईक’ और शेयर  भी किया है .उ.प्र. में आरक्षण और दुर्गा शक्ति नागपाल के मसले पर सरकार को अख़बारों  और फेसबुक की  सैकड़ों टिप्पणीयाँ के माध्यम से पहले ही प्रश्नांकित किया जा चुका है .इसलिए कँवल भारती पर कारवाई के मूल में रामपुर की स्थानीय राजनीति और आज़म खां के समर्थकों का सत्ता मद ही है .यह अनायास नहीं है कि कँवल भारती के विरुद्ध पुलिस में प्राथमिकी आज़म खां के स्थानीय मीडिया प्रभारी द्वारा ही दर्ज कराई गयी है . उल्लेखनीय यह भी है कि भारतीय दंड संहिता की जिन धारा 153  व 295 ए के अंतर्गत कँवल भारती के विरुद्ध मामला दर्ज किया गया है ये वही धाराएँ हैं ,जिनके अंतर्गत वरुण गांधी के विरुद्ध साम्रदायिक विद्वेष फ़ैलाने का मामला दर्ज किया गया था . जबकि कँवल भारती की फेसबुक टिपण्णीयों में किसी धर्म और सम्प्रदाय का न तो कोई उल्लेख है और न कोई उत्तेजक कथन . निश्चित रूप से  गिरफ्तारी की यह पुलिसिया कारवाई राजनीतिक दबंगों की प्रशासन से आपराधिक सांठ गाँठ का ही नमूना है . यह वास्तव में चिंता की बात है कि राजनीतिक दबंगई का सहारा लेकर उत्तर  प्रदेश ही नही देश के अन्य हिस्सों में भी प्रतिरोध की  जनतांत्रिक आवाजों का दमन किया जा रहा है .  भय का ऐसा वातावरण बनाने के दुष्प्रयास जारी  हैं ताकि लिखने पढने वालों का  जोखिम के इलाके में हस्तक्षेप दूभर हो जाये.
     
यह  दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस समूचे घटनाक्रम में कँवल भारती के रूप में एक ऐसे धर्मनिरपेक्ष और वाम चेतना से लैस अम्बेदकरवादी  बुद्धिजीवी की घेरेबंदी की गयी है जिसकी दलित विमर्श में एक हस्तक्षेपकारी भूमिका रही है.संकीर्ण राजनीतिक नजरिये से दूर कँवल भारती ने ‘कांशीराम के दो चेहरे’ सरीखी पुस्तक तब लिखी थी जब मायावती का शासन था और वे स्वयं राजकीय सेवा में थे .अपनी एक दर्ज़न से अधिक पुस्तकों में उन्होंने वर्णाश्रमी ब्राह्मणवाद का क्रिटीक रचते हुए एक समतावादी समाज का विकल्प प्रस्तावित किया है .उन्होंने अपने लेखन में दलित अतिवाद का भी विरोध किया है .यही कारण है कि समूचा बुद्धिजीवी समाज आज उनके पक्ष में एकजुट है .सोशल मीडिया पर भी उनके पक्ष में व्यापक एकजुटता देखने को मिल रही है .मानवाधिकार कार्यकताओं ने भी इस मसले पर मानवाधिकार आयोग के हस्तक्षेप की मांग की है .

    
यह आश्वस्तकारी है कि देश के तीनों बड़े लेखक संगठन प्रगतिशील लेखक संघ ,जनवादी लेखक संघ और जनसंस्कृति मंच सहित  स्वतंत्र लेखकों ,बुद्धिजीवियों और संस्कृतिकर्मियों ने भी इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर हमला मानते हुए अपना रोष और प्रतिरोध दर्ज कराया है और प्रदेश सरकार से कँवल भारती पर से तुरंत मुकदमा हटाने और माफी मांगने की मांग की है . एक अहंकारी मंत्री के समर्थकों के चलते कँवल भारती की गिरफ्तारी का  यह प्रकरण दुर्गाशक्ति नागपाल के निलंबन की घटना के बाद उ.प्र. सरकार की जनतांत्रिक छवि पर बडा कलंक है .उम्मीद की जानी चाहिए कि प्रदेश सरकार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की  रक्षा करते हुए अपनी दिनोदिन गिरती शाख को और अधिक गिरने से बचायेगी .

संपर्क : 09415371872.
  

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सोमवार, 8 जुलाई 2013

अर्चना वर्मा के कथादेश में छपे लेख पर वीरेन्द्र यादव का प्रतिवाद

समास में दिए गए साक्षात्कार में कवि कमलेश के सी आई ए समर्थन वाले बयान और उसके बाद चली बहस से आप परिचित हैं ही. इसी क्रम में अर्चना वर्मा ने उस पूरी बहस को 'बचकाना' जैसा बताते हुए और कमलेश के बयान को 'पासिंग रिमार्क' तथा 'कृतज्ञता के अतिरेक में एक असतर्क, असावधान क्षण में' की गयी भावुक अभिव्यक्ति ही नहीं  साबित किया बल्कि इस बहस में भागीदार लोगों की उम्र का मज़ाक उड़ाते हुए इसे 'युवकोचित उत्साह' भी कहा . अब हम अपनी उम्र वक़्त से पहले तो नहीं ही बढ़ा सकते लेकिन सी आई ए के समर्थन की परतें खोलने के लिए वयोवृद्ध होने की भी प्रतीक्षा भी नहीं कर सकते. खैर. उनके लेख के निहितार्थों और इस पूरी बहस के असली उद्देश्यों की पड़ताल करते हुए वरिष्ठ आलोचक वीरेन्द्र यादव ने यह प्रतिवाद लिखा है, जो कथादेश के ताज़ा अंक में प्रकाशित है. इसे हम पूरी क्रोनोलाजी के साथ यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं. साथ ही जनसत्ता में नहीं छापे गए मेरे और गिरिराज किराडू के प्रतिवाद भी इसी क्रम में जनपक्ष पर छापे जायेंगे.

और यह प्रतिवाद 

सी आई ए के प्रति ऋण बनाम ‘अज्ञान का अन्धेरा ‘

           

   
'असहमति और विवाद की संस्कृति '  (कथादेश ,जून २०१३) शीर्षक लेख में अर्चना वर्मा का यह कथन आश्वस्तकारी है कि ,"एकवीय विश्व में समतोल या प्रतिभार की जो भूमिका जरूरी है और थोड़ी बहुत निभायी जा सकती है उसके लिए संगठित प्रतिपक्ष का ,चाहे कितना भी अपर्याप्त ,विकल्प वामपंथ ही है ."  लेकिन ज्यों ही वे कमलेश जी के 'समास -५' के  अमरीका और सी आई ए विषयक कथन को 'सिर्फ एक पासिंग रिफरेन्स ' बताती हैं त्यों ही वे अपना तयशुदा पक्ष उजागर कर देती हैं .दरअसल सच यह है कि कमलेश का यह कथन महज 'एक पासिंग रिफरेन्स ' न होकर उनकी  उस सुचिंतित सोच का परिणाम है जिसकी धुरी कम्युनिज्म और वामपंथ विरोध पर टिकी है और इसे वे सुस्पष्ट भी करते हैं . दिक्कत कमलेश के उन समर्थकों की है जो  अमरीका और सी आई ए के पक्ष में दिए गए  उनके कथन का बचाव करते हुए निर्लज्ज रूप से उसके पक्ष में दीखना   नहीं चाहते क्योंकि ऐसा करना 'पोलिटिकली करेक्ट ' नहीं होगा .कमलेश का कथन कुछ यूं है ,"शीतयुद्ध के दौरान इस सत्य का सहधर्मी साहित्य धीरे धीरे उपलब्द्ध होने लगा .यह सब शीतयुद्ध के दौरान अपने कारणों से अमरीका और  सी आई ए ने उपलब्द्ध कराया ,इसके लिए मानव जाति अमरीका और सी आई ए की ऋणी है .भारतवर्ष को यह बौद्धिक खुराक शायद ही उपलब्द्ध होती अगर अमरीका और सी आई ए इस दिशा में सक्रिय नहीं होते .हमारा दुर्भाग्य है कि हिन्दी में नयी पीढी के अधिकांश लेखकों को सोवियत संघ के इन भयंकर अपराधों का ज्ञान भी नहीं है." और यह भी कि ,"इन जानकारियों के बाद भी लोग कम्युनिस्ट रह सकते हैं ,यह भारतवर्ष में फैले हुए अज्ञान के घोर अँधेरे में ही संभव है ."
               
दरअसल कमलेश की मुख्य चिंता कम्युनिज्म द्वारा फैलाये गए 'अज्ञान के घोर अँधेरे ' से मुक्ति और अभी भी भारत में कम्युनिस्टों के वजूद के बने   रहने से है . अर्चना वर्मा के 'विकल्प वामपंथ ही है’  की सदेच्छा और कमलेश की कम्युनिज्म द्वारा फैलाये गए  'अज्ञान के घोर अँधेरे’ व कम्युनिस्टों से मुक्ति पाने की मुहीम के बीच नट-संतुलन के निहितार्थों को पढ़ा जाना चाहिए . क्या ही अच्छा होता यदि अर्चना जी ने 'समास -६' में प्रकाशित कमलेश के  उन विचारों को भी पढ़ लिया होता जिनमें उन्होंने नात्सीवाद  के समर्थक जर्मन दार्शनिक हाइडेगर का यह कहकर बचाव किया  है कि भले ही वे नात्सी  पार्टी के सदस्य रहे हों लेकिन "वैचारिक स्तर पर उनका चिंतन नात्सी विचारधारा से अलग ही नहीं था ,बल्कि उसका गंभीर प्रत्याख्यान भी था.” ज्ञातव्य है कि नाजी विचारों के समर्थन के ही  कारण जर्मन विश्वविद्यालय में उनके अध्यापन पर रोक लगा दी गयी थी  .कमलेश  हाइडेगर को महात्मा गांधी के 'हिन्द स्वराज ' के निकट भी पाते हैं . उन्हें हाइडेगर के चिंतन में वह 'लोकोन्मुख राष्ट्रवाद ' दीखता है जिसके प्रतीक पुरुष के रूप में इन दिनों नरेंद्र मोदी को प्रस्तुत किया जा रहा है .आखिर ऐसा क्यों है कि जब जर्मनी सहित समूची दुनिया में हाइडेगर को हिटलर के समर्थक  दार्शनिक  के रूप में पढ़ा और समझा जा रहा है तब कमलेश उनमे गांधी से  सादृश्य तलाश रहे हैं . यह सचमुच गंभीर विचार का विषय  है कि जिन दिनों  हाइडेगर के नाजी संबंधों को  लेकर साएमन हेफर की   'हिटलर'र्ज सुपरमैन’ और इमनेल फाई की  'हाइडेगर -दि इंट्रोडक्सन आफ नाजिज्म इन्टू फिलासफी’  सरीखी पुस्तकें   समूचे विश्व के बुद्धिजीवियों के बीच गंभीर चर्चा के केंद्र में हों तब हिन्दी का एक  बुद्धिजीवी  हाइडेगर की औचित्यसिद्धि कर रहा हो . 
                 
अभी पिछले दिनों कमलेश ने  मार्क्सवादी इतिहासकार डी डी कोसंबी को अपना कोपभाजन इसलिए बनाया कि वे ब्राह्मणवाद को प्रश्नांकित करते हैं .कमलेश का कहना है कि "कोसंबी ब्राह्मणों पर ऐसे आरोप लगाते हैं जो नात्सियों द्वारा यहूदियों पर लगाये गए आरोपों से समान्तर है .इसके बाद 'फाइनल साल्युशन ' ही बच जाता है ,जिसके लिए राज्य पर मार्क्सवादियों का कब्ज़ा आवश्यक है” .(जनसत्ता ,१० मार्च २०१३) काजी जी ,दुबले क्यों शहर के अंदेशे से ! यानि वे मार्क्सवादी आन्दोलन को ब्राह्मणवाद  के लिए  बड़े खतरे के रूप में देखते हैं .यही कारण है कि वे साफगोई के साथ अपने इस निष्कर्ष को प्रस्तुत करते हैं कि ,"मार्क्सवादी इतिहासकार ,कम्युनिस्ट पार्टियाँ ,ईसाई प्रचारतंत्र ,ईसाई समर्थित दलित आन्दोलन सभी ब्राह्मण विरोधी प्रचार में लगे हैं ." (जनसत्ता ,२४ मार्च २०१३ ) दरअसल जिसे कमलेश ‘ब्राह्मण विरोधी’ प्रचार बताते हैं  उसे ही डॉ.आंबेडकर ‘दलितों की मुक्ति’ की युक्ति मानते थे .डॉ. आंबेडकर की दो टूक सोच थी कि, “असमानता ब्राह्मणवाद का आधिकारिक सिद्धांत है और समानता की चाहत रखने वाले निम्न वर्गों का दमन व उन्हें नीचा दीखाना उनका पश्चाताप रहित पवित्र कर्तव्य रहा है”.कमलेश जिस ईसाई समर्थित दलित आन्दोलन को ब्राह्मण विरोधी करार देकर उसके द्वारा अपनाई गयी ‘धर्मान्तरण’ की प्रक्रिया को  ख़ारिज करते हैं उसे ही दलित अपनी   सामाजिक ,आर्थिक और धार्मिक स्वतंत्रता और समता का माध्यम मानते रहे हैं  .  आश्चर्य की क्या बात यदि कमलेश के निशाने पर वे इतिहासकार ,कम्युनिस्ट पार्टियाँ और दलित आन्दोलन हों जो ‘ब्राह्मणवाद’  को बपर्दा करते हों .! अर्चना वर्मा को कमलेश जी की यह वैचारिक पृष्ठभूमि 'आधुनिक भारतीय मानस की औपनिवेशिक बनावट के बरक्स भारतीय मेधा की मौलिकता के अनेक परतीय विश्लेषण ’ लगती है तो यह उनका ‘उदारवादी’ दृष्टिकोण ही है .कमलेश के बचाव में अर्चना जी का यह तर्क सचमुच दिलचस्प है  कि ,  “ जो कम्युनिस्ट नहीं है उसे कम्युनिस्ट विरोधी होने का हक़ है” . इसी तर्क के आधार पर यह भी तो कहा जा सकता है कि जो ब्राह्मण है उसे ब्राह्मणवाद समर्थक होने का हक़  है . कमलेश  के सन्दर्भ में तो यह काफी कुछ सच भी है. कहना न होगा कि ब्राह्मणवाद को बचाने, नात्सी दार्शनिक के समर्थन और अमरीका व सी आई ए के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन की यह  मुद्रा महज एक 'पासिंग रिफरेन्स ' नहीं है . यह एक सोची समझी विचारसारिणी  का हिस्सा है .वामपंथ के विरुद्ध कमलेश के  मन-मस्तिष्क में  कितनी रोगमूलक वितृष्णा है इसका अनुमान कुलदीप कुमार द्वारा  फेसबुक (९ मई )पर लिखी इस आपबीती से लगाया जा सकता है ,"कमलेश कवि अच्छे हैं, लेकिन उनके विचार निकृष्टतम कोटि के हैं। शुक्रवार (७ मई) को 'द हिन्दू' में बलराज साहनी पर छपे मेरे स्तंभ को पढ़कर वे इतने उत्तेजित हो गए कि मेरे एक मित्र से मेरा फोन नंबर लेकर जीवन में पहली बार (और आशा है अंतिम बार भी) उन्होंने मुझे फोन किया। लगभग आधे घंटे तक वे मुझे लताड़ते रहे, बेहद अपमानजनक भाषा और टोन में। इसी क्रम में उन्होंने यह भी कहा कि बलराज साहनी के पुत्र परीक्षित साहनी ईसाई प्रचारक  हो गए हैं और लोगों को ईसाई बनाते हुए घूम रहे हैं। मैंने पूछताछ की तो पता चला कि यह सफ़ेद झूठ है। 'समास' में छपे अपने विवादास्पद इंटरव्यू में कमलेश लोहिया के समाजवाद से अपने दूर होने की बात कह चुके हैं। दरअसल वे पूरी तरह से ब्राह्मणवादी, अतीतोन्मुखी और वाम-विरोधी हैं। उनकी कुछ कविताओं में उनका पुराणप्रेम और सनातनधर्मी चेतना मुखर होकर व्यक्त भी हुई है जिसकी ओर मैंने 400 शब्दों की एक अति-संक्षिप्त समीक्षा में इशारा भी किया था। ... मुझे भेजे एक ई-मेल में उन्होंने मेरे बलराज साहनी वाले स्तंभ के हवाले से मुझ पर "घृणित झूठ" फैलाने का आरोप लगाया है। परीक्षित के बारे में उनका यह झूठ किस श्रेणी में रखा जाएगा?"  कुलदीप कुमार के इस कथन को संदिग्ध इसलिए नहीं माना जा सकता क्योंकि  ‘ ओम थानवी   २ जून के  ‘जनसत्ता’ के अपने स्तम्भ में  'साहित्य में फिर सी आई ए ' शीर्षक लेख में उन्हें 'स्वतंत्रचेता लेखक ' होने की सनद दे चुके हैं .
                   
कमलेश की इस वैचारिक पृष्ठभूमि को दृष्टिगत रखते हुए उनका सी आई ए और अमेरिका के प्रति नतमस्तक होना स्वाभाविक है .लेकिन जिस तत्परता  और उत्साह के साथ ' ओम थानवी  ने उनके पक्ष में  मोर्चाबंदी की है ,वह वास्तव में दिलचस्प  है .अर्चना वर्मा को 'उदारवादी '  और उनके  लेख को 'सुविचारित ,अकाट्य तथ्यों  व मिसाल कायम करने वाला'  करार देते हुए उन्होंने कमलेश जी को 'भावुक इंसान’ बताया और उनके विरुद्ध किये जा रहे 'क्षुद्र अभियान ' को नेस्तनाबूद करने के लिए शिखा बाँध ली .यानि अमरीका और सी आई ए के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन उद्दात्तता और इसे प्रश्नांकित करना छुद्रता. अर्चना वर्मा और ओम थानवी दोनों ने ही  बात मुद्दों से भटकाकर उम्र पर टिका दी गोया कि बहस के प्रतिभागी दूधपीते बच्चे हों ,बिना इस बात का ख्याल किये कि उस बहस में शामिल  कईयों की उम्र लगभग उनके बराबर या कुछ की तो अधिक ही थी .
                    
अर्चना वर्मा 
प्रश्न यह है कि  अमरीकी साम्राज्यवाद और सी आई ए के विरोध के लिए  वामपंथियों  की यह लानत मलामत क्यों ? आज जब एशिया , अफ्रीका ओर लातिनी अमरीका के सल्वादर आयेंदे ,शेख मुजिबुर्र रहमान और सद्दाम हुसैन सहित कई राष्ट्राध्यक्षों के खून का अपराध अमरीका और सी आई ए के  .रक्तरंजित हाथों पर हो और जब सी आई ए के  गुप्तचर ही  इसका खुलासा कर रहे हों तब हिन्दी के एक कवि ,एक संपादक और एक लेखिका द्वारा सी आई ए का यह बचाव क्यों ?याद किया जाना चाहिए अमेरिकी नाटककार हेराल्ड पिटर के वर्ष   2005 के उस नोबेल पुरस्कार भाषण को जिसमें उन्होंने बौद्धिकों की  'नैतिक संवेदना ' का प्रश्न उठाते हुए इस तथ्य को रेखांकित किया था कि द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जहाँ सोवियत संघ के राजनीतिक अपराध चर्चा का विषय बनते रहे हैं वहीं अमरीका की हत्यारी भूमिका पर पर्दा क्यों डाल दिया जाता है ?निकारगुआ ,चिली , इंडोनेशिया ,ग्रीक, उरुग्वे,ब्राजील,परागुवे ,हायती ,टर्की,फिलिपाईन्स ,ग्वाटेमाला ,एल साल्वाडोर आदि देशों में अमेरिका द्वारा किये गए तख्तापलट को याद करते हुए उनका सवाल था कि अमेरिका के अपराधों को दर्ज करने के लिए अभी कितना खून बहना शेष है ! जिन सोलझ्नित्सिन  ने अमरीका में शरण ले रही थी उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय के 1979 के अपने भाषण में अमरीकी जनतंत्र ,प्रेस  की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की आजादी का काफी कुछ मिथक भेदन करते हुए उसे सोवियत संघ के मुकाबले आदर्श  विकल्प मानने से इन्कार कर दिया था .  याद  किया जाना चाहिए अमेरिकी खुफिया अधिकारी फिलिप एगी की उस “सी आई ए डायरी” को जिसके प्रकाशन से अस्सी के दशक में समूचे विश्व में सी आई ए की भूमिका को लेकर हंगामा खडा हो गया था. फिलिप एगी का कहना था कि ,  “ ..संपादक ,राजनेता ,व्यवसायी घराने व अन्य लोग सी आई ए के प्रचारक , यहाँ तक कि पैसे के लिए भी ,हो सकते हैं बिना यह जाने कि उनके आका कौन हैं !” सी आई ए की कारगुजारियों का खुलासा करते हुए फिलिप का कहना था कि ,   “ क्रांतिकारी संगठनों में घुसपैठ की योजनाओं के साथ ही साथ मनोवैज्ञानिक और अर्धसैनिक कारगुजारियां  भी अंजाम दी जाती हैं .इनमें सार्वजानिक मीडिया में कम्युनिस्ट विरोधी प्रचार ,पार्टी पदाधिकारियों को फर्जी मामलों   में पुलिस द्वारा गिरफ्तार कराना , गुंडों के समूहों द्वारा धमिकियाना आदि शामिल हैं” . अभी इन्ही दिनों पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित  न्यूयार्क टाईम्स के पत्रकार मार्क मज़ेटी ने  अपनी नयी पुस्तक ‘ दि वे आफ दि नाईफ’ में शीतयुद्धोतर दौर में  सी आई ए की  बदलती हिंसक   भूमिका का खुलासा करते हुए लिखा है कि ,  “ सी आई ए अब  विदेशी सरकारों के दस्तावेजों को चुराने वाली पारंपरिक गुप्तचर सेवा भर न रह गयी है .सी आई ए अब हत्यारी मशीन सरीखी ऐसी संस्था बन गयी है जिसमें इंसानी जिदगियों का शिकार किया जा रहा है .”   
             
              
 यह सचमुच हैरत की बात है जब  सी आई ए के निशाने पर भारत सहित समूची दुनिया के देश हों और जब सोसल मीडिया सहित भारतीय नागरिकों की निजी स्वतन्त्रता पर उसकी तेज निगहबानी हो  और भारत का बौद्धिक और नागरिक समाज इसको लेकर उद्विग्न हो , तब हिन्दी के लोकवृत में  अमरीका और सी  आई ए के प्रति समूची मानवता के ऋणी होने की  सदाशयता व्यक्त की जा रही है . देश की शीर्ष बौद्धिक पत्रिका ‘इकोनोमिक एंड पोलटिकल वीकली ‘ने अभी अपने २२  जून के अंक में अमेरिकी गुप्तचरी के इस अभियान को नागरिक स्वतंत्रता का हनन मानते हुए इसके विरुद्ध नागरिक और राजनीतिक समाज द्वारा प्रभावी प्रतिरोध दर्ज करने का आह्वान किया है .  सी आई ए और अमरीका के प्रति कृतज्ञताज्ञापन  का यह अभियान और भी विस्मयकारी इसलिए  है कि न तो इन दिनों  हिन्दी में साठ के दशक सरीखी शीतयुद्धकालीन बहसे हैं और न ही  भारत में  वामपंथी विचारधारा का कोई नया विस्फोट . बल्कि इसके उलट जब स्वयं ओम थानवी के ही अनुसार डॉ.नामवर सिंह ,मैनेजर पण्डे से लेकर प्रणय कृष्ण  आदि  तक  ‘संकीर्ण मतवाद’ से मुक्त हो चुके हों तब इसकी क्या जरूरत !
               
यहाँ यह तथ्य दिलचस्प है कि कमलेश के सुर में सुर मिलाते हुए अर्चना वर्मा ने सी आई ए के प्रति ऋणी होने की औचित्यसिद्धि के लिए अन्ना अख्मातोवा, ओसिप मंदेल्स्ताम .मारिना त्स्वेतायेवा ,निकोलोई बोलोस्की, बुल्गाकोव ,युरी ओलेशा ,आइजक बाबेल अदि के साहित्य के प्रकाशन  का श्रेय सी आई ए को दे दिया .और साथ ही दूदिनेत्सेव के  उपन्यास ‘नाट बाई ब्रेड अलोन’ और सोल्झेनित्सिन के ‘वन डे इन दि लाईफ आफ इवानोविच’   के  प्रकाशन का सेहरा भी सी आई ए के सिर बाँध दिया ,जबकि इन दोनों पुस्तकों का पहला प्रकाशन सोवियत संघ में ही हुआ था . इन दोनों उपन्यासों को सोवियत प्रकाशन ‘.नोवी मीर’ ने क्रमशः १९५६ और   १९६२  में प्रकाशित किया. सोल्झेनित्सिन को  तो  ‘वन डे इन..’ के लिए रायल्टी के रूप में सामान्य से दुगनी राशि भी दी  गयी थी . यह सही है कि स्टालिन के व्यक्तिपूजा के दौर  और बाद में भी  अख्मातोवा , मन्देल्स्ताम  और पास्तनाक सहित कई लेखकों की कुछ रचनाएँ सोवियत सेंसर की शिकार हुईं और इनका विदेशों में प्रकशन हुआ .इनमें से कुछ लेखकों की रचनाएँ  पहली बार फ़्रांस ,ज़र्मनी ,ब्रिटेन और इटली के प्रकाशकों द्वारा  भी छापी गयीं . अमेरिका में भी कई चर्चित पुस्तकें प्रकाशित हुईं  , लेकिन यह कहना कि ये सारे प्रकाशन सी आई ए द्वारा संचालित थे उन प्रकाशनों  के लिए अपमानजनक है.   नहीं ,अर्चना जी  सी आई ए के आगे जहाँ और भी हैं . ओम थानवी आपके जिस ‘शोध’ पर मुग्ध हैं ,काश वह सचमुच शोध होता बकौल आपके ‘पूछताछ से मिली सूचनाओं’ पर न टिका होता . याद यह भी  रखना चाहिए कि जिन अख्मातोवा  को १९४६ में स्टालिन का कोपभाजन होना पड़ा उन्हें ही  १९५५ में उच्च स्तर की सुविधाएँ प्रदान कर ससम्मान पुनर्स्थपित किया गया .उनकी कविताओं का प्रथम चयन १९५८ में और वृहत संचयन १९६१ में सोवियत संघ  में ही प्रकाशित हुआ .१९६६ में उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी रचनाएँ तत्कालीन सोवियत   संघ में प्रकाशित होती रही थीं .इसी प्रकार बुल्गाकोव ,खेल्बिनिकोव,ओलेशा,प्लातोनोव और सेवेतायेवा अदि सहित कई ऐसे लेखक थे जिन्हें उत्तर-स्टालिन दौर में पुनर्प्रतिष्ठित किया गया और इन सभी लेखकों की रचनाओं को प्रकाशित भी किया गया . इन सारे तथ्यों की पुष्टि के लिए फिलहाल रोनाल्ड हिन्गले के पुस्तक ‘राशियन राईटर्स एंड सोवियत सोसाईटी’ और विटाली शेन्तिलान्स्की की ‘दि के जी बी आर्काविव्स’ को पढ़ा जा सकता है .
          
दरअसल कमलेश और अर्चना वर्मा की रूचि उन्ही पुस्तकों में है जो सी आई ए द्वारा कम्युनिस्ट विरोधी प्रचार के लिए भारत में सस्ते दामों में छापी गयी थीं . वरना वे त्रात्सकी की आत्मकथा ‘ माई लाईफ’ और स्टालिन की बेटी स्वेतलाना की पुस्तकों ‘ट्वेंटी लेटर्स टू ए फ्रेंड’ और ‘ओनली वन ईअर’ का जिक्र जरूर करते जिनमें स्टालिनकालीन सोवियत संघ का  अन्तरंग  और प्रामाणिक खुलासा होता है .क्या ही अच्छा होता यदि  अपने समय के विश्वविख्यात पत्रकार और स्टालिनकालींन दौर के विशेषज्ञ आईसक  दुएश्चर की पुस्तकों को भी इस सन्दर्भ में याद कर लिया जाता .स्टालिन और त्रात्सकी की शाहकार  जीवनी लिखने के साथ साथ उन्होंने ‘रशिया आफ्टर स्टालिन’, ‘हेरेटिक्स एंड रेनेगेड्स’ ,  ‘आयरनीज आफ हिस्ट्री’ सरीखी स्थाई महत्व की पुस्तकें लिखीं ,जिन्हें संदर्भित किये बिना स्टालिनकालीन रूस की कोई भी प्रामाणिक चर्चा  आज भी अधूरी  रहती है .  मंतव्य यदि सोवियत समाज के सच को जानने और कम्युनिस्ट तंत्र को आलोचनात्मक दृष्टि से समझने का ही हो तो यह सूची किंचित लम्बी हो सकती है. लेकिन यह अवश्य है कि इन सभी पुस्तकों का प्रकाशन सी आई ए की मदद द्वरा न किया जाकर विश्वप्रसिद्ध प्रकाशन गृह ‘पेंग्विन’ द्वारा किया गया है .स्वाभाविक है सी आई ए का शुक्रगुजार होने के लिए तो उन्ही पुस्तकों की चर्चा की जानी थी जो सस्ते दामों में छपकर प्रचार सामग्री के रूप में फुटपाथों पर बिकती थीं .
            
कमलेश को इस बात पर हैरत है कि सी आई ए द्वारा इतना कम्युनिस्ट विरोधी प्रचार साहित्य मुहैय्या कराने के बाद भी ‘लोग कम्युनिस्ट रह सकते हैं’ ! दरअसल  ब्राह्मणवाद की जिस जमीन पर  आज कमलेश खड़े हैं वहां से यही सोचा  जा सकता है . इस प्रसंग में याद आते हैं इतिहासकार एरिक हाब्स्बाम .  हाब्स्बाम से जब उनके अंतिम दौर में यह पूछा गया कि वे अंत तक कैसे कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्य बने हुए हैं  तो उन्होंने कहा कि , “ मुझे उन पूर्व-कम्युनिस्टों की  संगत में रहने का विचार  अत्यंत विकर्षक लगता रहा जो दुराग्रह  की हद तक  कम्युनिस्ट विरोधी हो गए थे और जो   ‘असफल देवता’ (गॉड दैट फेल्ड) की सेवा से तभी मुक्त हो सके थे जब  उन्होंने उसे  दानव में तब्दील कर दिया था. शीतयुद्ध के दौर में ऐसे लोग बहुतायत में थे”. शीतयुद्ध के इसी दौर में स्टीफेन स्पेंडर ,आर्थर कोसलर सहित बुद्धिजीवियों  को बड़ी जमात ‘कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम ‘ के बैनर तले अमरीका के  कम्युनिस्ट विरोधी अभियान का हिस्सा बनी थी .भारत में इस अभियान की  बागडोर उन दिनों ‘कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ की भारतीय शाखा के सचिव  प्रभाकर पाध्ये के हाथों  में थीं . अज्ञेय किस तरह इस अभियान से जुड़े थे इसका खुलासा ‘परिमल’ के केशव चन्द्र वर्मा ने अपने उस संस्मरण में किया है जो ओम थानवी द्वारा दो खण्डों में सम्पादित पुस्तक ‘अपने अपने अज्ञेय’ के दूसरे खंड में शामिल है . ‘परिमल’ के  १९५७ के ‘साहित्य और राज्याश्रय’ विषय पर आयोजित सम्मेलन का उल्लेख करते हुए  केशव चन्द्र वर्मा ने लिखा है  , “ उस सम्मलेन में दो कड़वी बातें हुईं –एक तो यह कि वात्स्यायन ने बिना परिमल की संयोजन समिति से स्वीकृति लिए एक मराठी लेखक प्रभाकर पाध्ये को निमंत्रित कर दिया जो ,उस समय ‘कांग्रेस फार कल्चरल फ्रीडम’ वाली अमेरिकी एजेंसी के एक सक्रिय कारकुन माने जाते थे .उन्होंने इस आयोजन के लिए कुछ रकम देने की बात भी वात्स्यायन के जरिये कहलाई .बस फिर क्या था इस पर ‘नकचढ़े परिमल दिमाग’ ने न केवल थू थू की ,बल्कि प्रकारांतर से पाध्ये को अपमानित भी किया . .पाध्ये का अपमान ,प्रस्ताव पास करने का विरोध और और परिमल के भीतर से ऊभरता हुआ अपने को मुक्त करने का अंदाज वात्स्यायन को कहीं गहरे स्तर पर काट गया .उन्हें सदा आँखें मूंदकर साथ चलने वालों की तलाश थी ,जो परिमल से उन्हें अंततः नहीं मिला”.(अपने अपने अज्ञेय खंड २ –सं. ओम थानवी ,पृष्ठ ६१७-६१८)
             
दरअसल ‘अज्ञेय पंथ’ की  शीतयुद्ध के  दौर की  यही वह  विरासत है जिसे अज्ञेय के ‘शिविर शिष्य’ ओम थानवी आज भी ढो रहे हैं . यहाँ दिलचस्प यह भी है कि अमेरिकी मदद को नकारने की ‘थू थू’  का ‘परिमालियन’ दायित्व भी आज केवल उन वाम मतवादियों का रह गया है जो पहले से ही इसके लिए प्रतिज्ञाबद्ध थे .अर्चना वर्मा  जिसे  ओम थानवी द्वारा   फेसबुक पर   ‘मजा लेते से अंदाज में कोंचना’ कह रही हैं वास्तव में वह अज्ञेय के महिमामंडन का ऐसा  ‘राजसूय यज्ञ’ है जिसमें वामपंथी विचारधारा को यज्ञ की समिधा के रूप में स्वाहा किया जा रहा है . इस यज्ञ के दोषपूर्ण मन्त्राचार को जब प्रश्नांकित किया जाता है तब ओम थानवी उन्हें ‘मतवादी ,शोहदे ,मनचले और पण्डे’ जैसी उपाधि देकर संवाद के कपाट बंद कर देते हैं . इतना ही नहीं वे फेसबुक के अपने अभियान को ‘साहित्य में फिर सी आईए’ जैसी सनसनी के साथ ‘जनसत्ता’ में परोस देते हैं  और कुतर्कों व मिथ्या तर्कों का प्रतिवाद किये जाने पर उसे प्रकाशित तक करने की जनतांत्रिकता का निर्वाह नहीं करते . यह सचमुच विस्मयकारी है कि अर्चना वर्मा इस सब की अनदेखी करके ‘दलबद्ध आयोजन बनाम एकाकी योद्धा’ का रूपक गढ़ती हैं . क्या सचमुच उन्हें कमलेश ,अशोक वाजपेयी ,ओम थानवी और उदयन वाजपेयी की जुगलबंदी नहीं सुनायी दे रही है ? क्या यह अनायास है कि ज्यों ही  कमलेश का सी आई ए और अमेरिका के प्रति शुक्राने का साक्षात्कार अशोक वाजपेयी द्वरा प्रकाशित रज़ा फाऊंडेशन की  पत्रिका ‘समास’ में प्रकाशित होकर विवादित होता है त्यों ही ओम थानवी पहले फेसबुक पर फिर ‘जनसता’ के पृष्ठों पर मोर्चा संभाल लेते हैं !  ‘प्रतिलिपि’ पत्रिका  की कथित खरीद पर  ओम थानवी की गलतबयानी को लेकर ज्यों ही  उन्हें घेरा जाता है , अशोक वाजपेयी उनके बचाव में ‘नरो वा कुंजरो’ की शैली में  बयान के साथ प्रस्तुत हो जाते हैं . कमलेश के विचारों और कविता पर जव  फेसबुक पर प्रसंगवश मंगलेश डबराल सवाल उठाते हैं तो क्या यह यूं ही  है कि ‘समास’ के संपादक उदयन वाजपेयी ‘जनसत्ता’ में नया मोर्चा खोल देते हैं , और कम्युनिज्म को विदेशी विचारधारा कहकर ख़ारिज करते हैं .क्या कमलेश के दो-दो कविता संग्रहों का रजा फाऊंडेशन के तत्वावधान में अशोक वाजपेयी द्वारा विमोचन महज एक संयोग है ? आखिर ऐसा क्यों है कि जब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के उपाध्यक्ष की संस्था के कार्यक्रम में अशोक वाजपेयी के एकल कविता पाठ पर सवाल उठाये जाते हैं तो उनके बचाव में ओम थानवी यह ढाल लेकर खड़े हो जाते हैं कि उन्हें ‘कवि’ जगदम्बा प्रसाद दीक्षित ने आमंत्रित किया था ? अब यह कौन ,कैसे कहे कि न तो जगदम्बा प्रसाद दीक्षित कवि हैं और न उन्होंने अशोक वाजपेयी को आमंत्रित किया था . जगदम्बा प्रसाद दीक्षित शिव सेना के मुखपत्र ‘सामना’  के स्तंभकार रहे हैं और शिव सेना से अपनी वैचारिक नजदीकियों के ही चलते ‘मनसे’ के साहित्यिक मंच से सम्बद्ध  हैं . हाँ, एक समय उन्होंने ‘मुर्दाघर’ सरीखा बहुचर्चित उपन्यास  और ‘गंदगी और जिन्दगी’ सरीखी कुछ कहानियां हिन्दी में  जरूर लिखी थीं . अर्चना वर्मा उपरोक्त  सारे सहकार की अनदेखी करती हैं तो क्यों ? कहीं इसलिए  तो नहीं कि वे स्वयं भी अज्ञेय की ‘वत्सल निधि’ के लेखक शिविरों की सहभागी रही हैं?  

 दो टूक बात तो यह है कि अज्ञेय के  शताब्दी  समारोह के अंतर्गत किये जाने वाले आयोजनों के बहाने ओम थानवी ने अज्ञेय की पुनर्प्रतिष्ठा का जो अभियान शुरू किया था , अब विचारधारा और वामपंथ विरोध के रूप में यह उसकी तार्किक परिणति है . कमलेश ने तो कन्युनिस्टों को नेस्तनाबूद करने के लिए   धूनी रमा ही ली है . इस सिलसिले में वे अब  ‘रूसी संस्कृति के उद्भव और विनाश’ की चर्चा के  बहाने कम्युनिस्टों की खबर लेंगें .अशोक वाजपेयी ने भी गिरिराज किराडू को लिखे पत्र में स्वयं के विचारधारा विरोधी होने का फिर से ऐलान कर दिया है .ओम थानवी भी भोपाल के ‘वनमाली समारोह’ में साहित्य को विचारधारा से अलग रखने की अपनी मंशा प्रकट कर चुके हैं . और अर्चना जी तो सी आई ए का साथ मकतल तक देने को प्रस्तुत ही हैं .कहने की आवश्यकता नहीं कि यह ‘विचारधारा के विरोधियों’ द्वारा वामपंथी ‘ अज्ञान के अँधेरे’ को मिटाने की नयी मुहीम  है . यह सचमुच दुर्भाग्यपूर्ण  है कि जब दुनिया के बुद्धिजीवी नागरिक स्वतन्त्रता के विरुद्ध अमेरिकी साम्राज्यवाद और उसकी  गुप्तचर संस्था  की हत्यारी  भूमिका को लेकर चिंतित हों तब हिन्दी की दुनिया में कुछ लोगों द्वारा  वामपंथ और विचारधारा का बिजूका खड़ाकर अमेरिकी साम्राज्यवाद  के पक्ष में सहमति  का वातावरण बनाया जा रहा है . काश इन योद्धाओं को यह समझ होती कि इन्होने जिनके जिरिह- बख्तर  पहन रखे हैं वे ही इनके देश और समाज पर हमलावर  हैं ! सचमुच ग़ालिब ने इन्ही वक्तों के लिए लिखा था कि 

          “दे  और  दिल उनको, जो  न दे मुझको जुबाँ और !”

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