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शुक्रवार, 30 जनवरी 2015

गांधीजी की हत्या, आर.एस.एस. और मिठाईयां

  • आलोक बाजपेयी 



राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके आनुषंगिक संगठनों के लिए महात्मा गांधी की हत्या हमेशा एक हर्ष
, उन्माद और गौरव का प्रतीक रहा है। ऐसा होना बिल्कुल स्वाभाविक भी है। गांधी का जीवन हर उस चीज के खिलाफ था, जिसे आरएसएस सही समझता रहा है। जैसे धार्मिक दम्भ, अभिमान और अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ समझना और दूसरे धर्माें को नीचा मानना आरएसएस की धार्मिक सोच का एक स्थाई आधार है। यह सोच उनके लिए प्राण वायु के समान है। गांधी की सोच धर्म के मामले में इससे एकदम उलट है। उनके लिए धार्मिक होने का मतलब था, मानव मात्र से असीम प्यार, स्वयं के लघु होने का भाव और मुसीबतों में बिना विचलित हुए दृढ़ता से झूझने की आन्तरिक क्षमता का स्रोत। आरएसएस और गांधी धर्म की दो विपरीत व्याख्याओं के बिन्दु हैं। अतः यदि गांधी की हत्या पर आरएसएस ने खुशियां मनाईं या उनके संस्थानों में गांधी के हत्यारे गोडसे को नायक के रूप में चित्रित करने वाली किताबें बेची या पढ़वाई जाती हैं तो इसमें कुछ भी आश्चर्य सा नहीं। आखिर अपने सबसे प्रमुख शत्रु की हत्या पर खुश होने का अधिकार तो उन्हें मिलना ही चाहिए न?

अस्वाभाविक मात्र यह है कि आरएसएस गांधी की हत्या की इस खुशी को जहां एक ओर तमाम सूक्ष्म तरीकों से व्यक्त करता रहता है, वहीं दूसरी ओर इससे इनकार भी करता रहा है। यह लेख इसी व्यक्त-अव्यक्त खुशी को समझने का लघु प्रयास भर है।
पहली बात जो गांधी और आरएसएस के बीच का बुनियादी अन्र्तविरोध है, वह यह कि जहां गांधी सार्वजनिक जीवन में पूरी पारदर्शिता के हिमायती थे, वहीं गोपनीयता आरएसएस की मूलभूत विशेषता है। जहां गांधी अपने दिल और दिमाग को बेबाकी से बिना किसी से डरे हुए लिखते-बोलते रहते थे, वहीं दूसरी ओर आरएसएस के लाखों स्वयंसेवकों या उसके शीर्ष नेतृत्व के लोग सार्वजनिक तौर पर लिखने-पढ़ने या बोलने के तरीकों में विश्वास ही नहीं करते। गांधी का समग्र लेखन सौ जिल्दों में छपा है और उनके बारे में सब पढ़ने-जानने के लिए दस-बीस साल लग जाएंगे, वहीं आरएसएस के बारे में आरएसएस के लोगों द्वारा लिखा-बोला पुस्तक बाजार में लगभग अप्राप्य है। हेडगेवार, गोलवरकर और अन्य आरएसएस सरसंघ चालकों की जो भी मुटठी भर पुस्तिकाएं हैं भी, वो भी पुस्तक बाजार में अनुपलब्ध रखी जाती हैं। वास्तव में आरएसएस संगठन की सोच क्या है, यह जानना सामान्य जन के लिए बहुत मुश्किल है, क्योंकि एक दुर्दांत गोपनीयता आरएसएस के मूल विचार, उनकी कार्यपद्धति, उनके संगठन के लोगों के नाम पते, उनका वित्तीय आधार, उनके अभियान और वो सारी बातें, जिसे जानने का लोकतांत्रिक समाज में सभी को हक होना चाहिए, एक गोपनीय रहस्यालोक में ढका-छिपा रहता है। तो, गांधी और आरएसएस दो अलग-अलग तरह के एक-दूसरे के विरोधी विचार हैं। फिर, गांधी की हत्या पर आरएसएस क्यों न खुश हो?

दोनों में एक दूसरा बुनियादी अन्तर राजनीतिक विचारधारा का है। गांधी जहां लोकतंत्र के दायरे में कार्य करते थे और अहिंसा, सत्य जैसे सिद्धान्तों के सहारे अपनी बातों को फैलाने में कुशल रणनीतिज्ञ थे, वहीं आरएसएस का मुख्य वैचारिक आधार और रूझान फासीवाद है। फासीवाद के नायक हिटलर उनके आदर्श आज भी हैं। फासीवाद एक सोच है, जिसके काम करने के तौर-तरीके जहां एक ओर गोपनीय एजेण्डे के तहत चलते हैं, वहीं दूसरी ओर उसमें किसी धर्म विशेष के प्रति नफरत, हिंसा अपने प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप में गुथी रहती है। भारत में आरएसएस के अधीन जो फासीवादी विचारधारा उसकी स्थापना के दिन से ही पल-बढ़ रही है, उसके मूल में मुस्लिम विरोध है। इसी कारण से आरएसएस उन्हीं प्रश्नों मंे दिलचस्पी लेता है, जिसमें घुमा-फिरा कर किसी न किसी तरह किसी मुस्लिम व्यक्ति या इस्लाम को दोषी बनाया जा सके। चूंकि आरएसएस एक लोकतांत्रिक संगठन नहीं है, अतः उसके भीतर निर्भीक व तर्कपूर्ण ढ़ंग से बात रखने की न तो कोई परम्परा रही है और न ही यह स्पेस रखा गया है। यही कारण है कि आरएसएस के लोगों के साथ कोई अर्थपूर्ण संवाद-विवाद किया जा सकना लगभग असम्भव है। चूंकि आरएसएस एक फासीवादी परिधि में ही सोच पाती है, अतः छल-कपट, धोखा, झूठ का व्यापार और कुटिल चालाकी उनके सोच व कार्य पद्धति का एक अभिन्न अंग है। आरएसएस में मानवीय मूल्य और नैतिकता जैसी चीजों का स्थान नहीं रहता, क्योंकि फासीवादी सोच पद्धति में साध्य ही अभीष्ट रखा जाता है, साधन की शुचिता एक अनर्गल प्रलाप समझा जाता है। यही कारण है कि हिंसा (शारीरिक व मानसिक) उनका सबसे विश्वसनीय हथियार आज भी बना हुआ है। तो गांधी और आरएसएस के तौर-तरीके, सोच में इतना दुश्मनीपूर्ण अन्तर है कि आरएसएस के पास गांधी की हत्या पर दुखी होने का लेशमात्र भी कारण मौजूद नहीं है।
दोनों में एक अन्य बुनियादी अन्तर राष्ट्रवाद की अवधारणा का है। गांधी का राष्ट्रवाद से तात्पर्य सभी भारतवासियांे से था, जिसमें सभी को अपनी इच्छा अनुरूप जीने का हक हो और सभी का मान-सम्मान सुरक्षित रहे। कोई एक बिरादरी दूसरी बिरादरी पर हावी न होने की कोशिश करे, एक संस्कृति दूसरी संस्कृति को नीचा दिखाने की ही जुगत में न लगी रहे। गांधी के लिए लगातार देशवासियों को यह याद दिलाना जरूरी था कि अपने देश से लगाव रखने का मतलब यह नहीं कि हम अपने आप को इतना श्रेष्ठ समझने लगें कि दूसरे मुल्क और उनकी संस्कृतियां बिल्कुल हीन लगें। इसके अलावा गांधी ने धर्म के आधार पर राष्ट्रवाद की आवधारणा को पूर्णतः नकार दिया। यान् िकी हिन्दुस्तान में कोई एक धर्म वाला समुदाय ही अपने को उसका कर्णधार समझने लगे। संक्षिप्त में, राष्ट्र का आधार धर्म नहीं हो सकता। गांधी समझते थे कि जिन देशों में वहां की जनता ने गुमराह होकर धर्म को राष्ट्र का आधार बनाया, उन्होंने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारी। इसीलिए गांधी ने राष्ट्रवाद की एक उदार, उदात्त, बहुसंस्कृति धर्मी और अन्तर्राष्ट्रीयतावादी तहजीब को ही अपनी सोच का आधार बनाया। आरएसएस की सोच इसके ठीक उलट है। आरएसएस स्वयं को एक ’’राष्ट्रवादी’’ संगठन कहता तो जरूर है, परन्तु उसका तथाकथित राष्ट्रवाद मात्र ’’हिन्दू पुनरूत्थानवाद’’ और संकीर्ण फिरकापरस्ती से ज्यादा कुछ नहीं। सच तो यह है कि भारत में राष्ट्रवाद का जो नक्शा दादाभाई नौरोजी, रानाडे और अन्य महान देशभक्तों ने बनाया तथा जिसे बाद में गोखले, तिलक, गांधी, नेहरू, पटेल, सुभाष बोस व अन्य ने अपने खून-पसीने से सीचा, उसका आरएसएस के हिन्दू पुनरूत्थानवादी दृष्टिकोण से दूर-दूर तक लेना-देना नहीं है। आरएसएस के लिए राष्ट्रवाद की एकमात्र बुनियादी बात मुस्लिम विरोध है। तो फिर यह समझना आसान ही है कि क्यों आरएसएस ने गांधी की हत्या पर खुशियां मनाईं, जो आज भी किसी न किसी रूप में जारी हैं।
आरएसएस हिन्दू पुनरूत्थान के नाम पर जो काम अपनी पैदाइश से करता रहा है, वहीं काम आजादी के पहले मुस्लिम लीग ने मुसलमानों के लिए किया। मुस्लिम लीग को अपनी फिरकापरस्ती के कुचक्र में आरएसएस से ज्यादा सफलता मिल गई और वो पाकिस्तान बना लेने में कामयाब भी हो गया। हिन्दुस्तान में आरएसएस को यह बुरी तरह सालने लगा कि मुस्लिम लीग ने तो मुसलमानों को एकजुट कर पाकिस्तान बना लिया, लेकिन हिन्दू बेवकूफ के बेवकूफ ही रहे और वो आरएसएस के झण्डे तले नहीं आए और एक हिन्दू राष्ट्र नहीं बना पाए। चूंकि गांधी भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के सबसे बड़े नेता और प्रतीक थे, तो आरएसएस ने इसका ठीकरा उन्हीं के सर पर फोड़ना सही समझा। उसे यह एक अवसर भी लगा कि देश बटवारे से लोगों के मन में जो गुस्सा मुसलमानों के खिलाफ भर गया है, उसका फायदा उठाना चाहिए। नाथूराम गोडसे, जो कि हिन्दू पुनरूत्थानवादी सोच और आरएसएस की विचारधारा से ग्रसित था, उसने 30 जनवरी, 1948 को गांधी की हत्या कर वह अवसर आरएसएस को दे दिया कि वह खुशियां मना सके, मिठाईयां बांट सके। अब वही सोच गोडसे की मूर्तियां लगा कर पुराना कर्ज उतारना चाहती है।
गांधी ने कहा था कि मेरी जान की चिन्ता मत करो मैं अपनी कब्र से भी बोलता रहूंगा। गांधी अभी भी बोल रहे हैं।

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आलोक बाजपेयी एक इतिहासकार एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

शनिवार, 24 नवंबर 2012

नौसेना विद्रोह-हंगल साहब-गांधी जी


सुरेन्द्र मनन का यह स्मृतिरेख कथन पत्रिका में छपा है. इसमें ए के हंगल ने नौसेना विद्रोह के दौर के राजनीतिक-सामाजिक माहौल पर विस्तार से और बहुत रोचक तरीके से बात की है. यहाँ यह लेख पत्रिका की सम्पादक की अनुमति से साभार...




वह विद्रोह एक वर्ग-संघर्ष था
ए. के. हंगल
प्रस्तुति: सुरेंद्र मनन


ए. के. हंगल (पूरा नाम अवतार कृष्ण हंगल) थिएटर को समर्पित एक कलाकार, इप्टा के सक्रिय सदस्य, सुपरहिट फिल्मों के सफल चरित्र अभिनेता और अपने सरल-सौम्य व्यक्तित्व के कारण फिल्म इंडस्ट्री में ‘हंबल साहब’ के तौर पर जाने जाते थे। लेकिन उनके व्यक्तित्व का एक अन्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष भी था, जिसके बारे में कम लोग जानते हैं। वह पक्ष है उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता। आजादी से पहले अविभाजित कम्युनिस्ट पार्टी के वे कर्मठ सदस्य थे और जन-आंदोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही। भारत विभाजन के बाद कराची से वे बंबई आ गये और इप्टा आंदोलन को पुनर्जीवित करने में उन्होंने प्रमुख भूमिका निभायी। फिल्म जगत में इतने वर्ष बिताने के बाद भी उनकी प्रतिबद्धता कायम रही। 

रायल इंडियन नेवी में 1946 में हुआ विद्रोह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास का ऐसा विस्फोटक अध्याय है, जिसे अंग्रेजी हुकूमत ने दबाने, गलत ढंग से व्याख्यायित करने और नष्ट कर देने का हर संभव प्रयास किया। स्वतंत्र भारत में भी विभिन्न कारणों से यह अध्याय अनछुआ ही रहा और इतिहास में इस विद्रोह का सरसरी तौर पर ही वर्णन मिलता है, जबकि नौसैनिकों के इस क्रांतिकारी संघर्ष के बाद ही अंग्रेज यह समझ पाये कि उनके साम्राज्य की नींव हिल चुकी है और अब हिंदुस्तान में उनका और अधिक टिके रह पाना संभव नहीं।

इस विषय पर केंद्रित फिल्म बनाने के सिलसिले में मैं कुछ ऐसे व्यक्तियों की तलाश में था, जो नौसेना विद्रोह के चश्मदीद गवाह रहे हों। विद्रोह के समय हंगल साहब कराची में थे और न केवल उन घटनाओं को उन्होंने करीब से देखा था, बल्कि नौसेना के उस क्रांतिकारी कदम का खुलकर समर्थन भी किया था। मैंने उनसे संपर्क किया, तो अत्यंत व्यस्त होने के बावजूद फिल्म के लिए इंटरव्यू देने को वे तुरंत राजी हो गये। साक्षात्कार का समय एक घंटा तय हुआ था, लेकिन उस समय और उस दौर को याद करते हुए हंगल साहब स्मृतियों में इतने खो गये कि बातचीत तीन घंटे तक खिंच गयी। यहाँ उस साक्षात्कार में हंगल साहब द्वारा कही गयी बातों को उनके संक्षिप्त वक्तव्य के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। उनका यह वक्तव्य भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में नौसेना विद्रोह के महत्त्व और तात्कालिक राजनीतिक परिस्थितियों के बारे में हंगल साहब की सोच और समझ को रेखांकित करता है।--सुरेंद्र मनन




आपने फोन पर जब मुझसे रायल इंडियन नेवी में हुई बगावत के बारे में बात की, तो उस समय मैं शूटिंग पर जाने के लिए तैयार हो रहा था। मैं एकदम चैंका और मुझे हैरानी हुई कि यह कौन है, जो इतना अरसा गुजर जाने के बाद इस बगावत के बारे में न सिर्फ बात कर रहा है, बल्कि फिल्म भी बनाना चाहता है। मुझे हैरानी इसलिए हुई कि इस बगावत को तो चाहे अंग्रेजी सरकार हो या आजाद हिंदुस्तान की सरकार, एक साजिश कहकर उसे भुला देना चाहती थी। फिर इस पर फिल्म कैसे बन रही है? तो यूँ समझिए कि मैं खुद आपसे मिलना चाहता था। उस दिन शूटिंग करने के बाद जब मैं सेट पर बैठा आराम कर रहा था, तो वे सब बातें याद आने लगीं। उसके बाद हर रोज वही खयाल आने लगे। बहुत-से किस्से हैं उस बगावत से जुड़े। आप इस पर रिसर्च कर चुके हैं, तो जानते होंगे कि बगावत की शुरुआत यहीं बंबई से हुई थी। ‘तलवार’ से, जो रायल इंडियन नेवी का सिग्नल स्कूल था। उसके बाद बगावत एक जहाज से दूसरे जहाज और रायल इंडियन नेवी के एक बेस से दूसरे बेस तक आग की तरह फैल गयी।

रायल इंडियन नेवी में जो बगावत हुई, उसकी ऊपरी तौर पर और फौरी वजह यह थी कि हिंदुस्तानी जहाजियों की कुछ माँगें थीं--अच्छा खाना, बेहतर सर्विस कंडीशंस और अंग्रेज अफसरों की जो बदसुलूकी थी, उसकी मुखालफत। लेकिन असल वजह यह नहीं थी। असल कारण दूसरे थे, इससे बड़े थे।

उस समय की दुनिया का हम जायजा लें, तो देखेंगे कि बड़े उथल-पुथल का दौर था वह। दूसरे विश्व युद्ध के खत्म होने से फासिज्म का खात्मा हुआ और इस स्थिति ने समाजवादी ताकतों और पश्चिमी जनतांत्रिक ताकतों को विजय दिलवायी थी। सोवियत संघ ने गठबंधन के सामने यह बात रखी थी कि अगर हमारी जीत होती है, तो हमारा यह फर्ज बनता है कि गुलाम देशों को आजादी दिलवाने में मदद करें। जनतांत्रिक ताकतों को विश्व युद्ध में जब जीत हासिल हुई, तो दुनिया भर में उस जीत का असर यह हुआ कि जितने गुलाम देश थे, उन्हें यह उम्मीद बँधी कि अब वे भी आजाद हो जायेंगे। हम हिंदुस्तानियों को भी यह लगने लगा कि अब आजादी दूर नहीं और अंग्रेजों की गुलामी से जल्द ही हमें मुक्ति मिलने वाली है। अंग्रेजों के डेलिगेशन हिंदुस्तान आते, तो जनता को तरह-तरह की उम्मीदें बँधतीं। 

दूसरी बात, जिसे लोग भूल जाते हैं, या जान-बूझकर जिसका जिक्र नहीं करते, या नहीं करना चाहते, वह यह कि हिंदुस्तान में उस समय कामगार वर्ग का आंदोलन बहुत जोरों पर था। बंगाल में किसान आंदोलन, दक्षिण भारत में अनेक प्रगतिशील और सांस्कृतिक आंदोलन जोरों पर थे। जगह-जगह हड़तालों, जुलूस, बेचैनी और गुस्से का माहौल था। इस सबके अलावा आजाद हिंद फौज के बंदियों को छुड़वाने के लिए देश भर में जनता ने जिस तरह से प्रदर्शन किये, उससे अंग्रेज हुकूमत जहाँ एक ओर डरी हुई थी, वहीं वह बहुत हिंसक भी हो उठी थी। तो यह ऐसा समय था कि छोटी-सी चिंगारी से भी आग भड़क सकती थी। ऐसे माहौल में राॅयल इंडियन नेवी के हिंदुस्तानी जहाजियों ने बगावत कर दी। वह बगावत थी तो एक चिंगारी, लेकिन उसका नतीजा बहुत बड़ा था। 

यहाँ मैं एक और बात का जिक्र करना चाहता हूँ कि बदनसीबी से उस समय हिंदुस्तान की जनता तीन धाराओं में बँटी हुई थी। एक धारा थी कांग्रेस के पक्ष में, दूसरी मुस्लिम लीग, जो विभाजन चाहती थी, और चाहती थी कि पाकिस्तान बने, और तीसरी कामगार वर्ग की धारा--जो धर्मनिरपेक्ष ताकतों का आंदोलन था, कम्युनिस्ट आंदोलन था। लेकिन तीनों धाराओं की जनता अंग्रेजों के खिलाफ भड़की हुई थी। नेवी में जब बगावत हुई, तो जहाजियों ने हर बेस पर अपने जहाजों पर तीन झंडे फहराये--कांग्रेस, मुस्लिम लीग और कम्युनिस्ट पार्टी के। यूनियन जैक उन्होंने उतार फेंका था। उनका मकसद यह था कि देश की जनता जब ये तीनों झंडे देखेगी, तो उन्हें सब धाराओं का समर्थन हासिल होगा। और वे ठीक ही थे। क्योंकि ऐसा ही हुआ। देश भर की जनता आपसी भेदभाव भूलकर जहाजियों के समर्थन में सड़कों पर उतर आयी। फ्लोरा फाउंटेन पर जबर्दस्त प्रदर्शन हुए। सारा बंबई शहर बंद। सेना और जनता दोनों की यह एकता जो अंगे्रजों के खिलाफ इस बगावत में बनी, यह अभूतपूर्व वाकया था। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। हाँ, गदर के समय ऐसा हुआ था, लेकिन उसके बाद यह एकता अब बनी थी। उस समय बंबई में मेरे आर्टिस्ट मित्र थे चित्तो प्रसाद। उन्होंने इस बगावत को अपने रेखांकनों में उतारा कि कैसे नेवी के जवान जंजीरें तोड़कर अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़े हुए और अंग्रेज हुकूमत ने कैसे उन पर और हिंदुस्तानी जनता पर अत्याचार किये। 

मैं उस समय कराची (अब पाकिस्तान) में था और छोटा-मोटा कम्युनिस्ट लीडर था। टेªड-यूनियन आंदोलन में सरगर्म था। हमने जब रेडियो पर इस बगावत की खबर सुनी, तो कराची बंद की काल दे दी। आप हैरान होंगे यह जानकर कि हम सिर्फ बीस-पच्चीस लड़के थे, लेकिन जब काॅल दी, तो सारा कराची शहर बंद! एक पान वाले तक की दुकान न खुली। शाम को हमने ईदगाह मैदान में मीटिंग रखी थी। हिंदू, मुसलमान, सिख, ईसाई, पारसी--सब ईदगाह मैदान पहुँचे। मुझे यह कहते हुए अफसोस हो रहा है कि मुख्यधारा की जो पार्टियाँ थीं, उनके लीडरान को यह बात पसंद न थी कि जाति-धर्म-पार्टी भुलाकर जनता इस तरह से एकजुट हो। कांग्रेस और लीग के नेता भी इस मीटिंग में आये। उन्होंने मीटिंग बर्खास्त करवाने की कोशिश की और कहा कि ऐसी मीटिंग करने से अंग्रेज हुकूमत तक गलत संदेश जायेगा। मुझे अच्छी तरह याद है कि पब्लिक ने हूट किया, गो बैक के नारे लगाये और उन लीडरों को वहाँ से चले जाने पर मजबूर कर दिया। बाद में धड़धड़ाती हुई पुलिस पहुँच गयी। उसने भीड़ पर गोली चला दी। हर तरफ अफरा-तफरी मच गयी। दर्जन भर लोग इस हादसे में मारे गये। मैं बाल-बाल बचा। 

ऐसा ही एक और वाकया मुझे याद है, जब पेशावर में गोली चली और खून से लथपथ मैं घर पहुँचा था। अब्दुल गफ्फार खान और गांधी की गिरफ्तारी के विरोध में तब एक जुलूस निकाला गया था। जुलूस में ज्यादातर पठान थे। माँग यह थी कि खान और गांधी को रिहा किया जाये। किस्साखानी बाजार में जब यह सब हो रहा था, तो पुलिस आ पहुँची। पुलिस हालात पर जब काबू न पा सकी, तो फौज को बुलाया गया। पहली ट्रक जो फौज की आयी, वह थी गढ़वाली रेजीमेंट। उसे गोली चलाने का हुक्म दिया गया। उन्होंने बंदूकें उठायीं, सामने देखा और बंदूकें नीचे रख दीं। कहा कि ये निहत्थे लोग हैं, हम इन पर गोली कैसे चला सकते हैं। इस रेजीमेंट का नेता था चंद्रसिंह गढ़वाली। उस समय यह बहुत बड़ी बात थी कि अंग्रेज अफसरों की कोई हुक्मउदूली करे, वह भी फौज में। उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और कोर्टमार्शल के बाद 14-14 साल की सजा दी गयी। 

चंद्रसिंह गढ़वाली मेरा बहुत बड़ा प्रेरणास्रोत रहा कि उस समय वह इतनी हिम्मत कर सका। हमारे इतने राष्ट्रीय सम्मान हैं, पुरस्कार हैं--पद्म विभूषण, पद्म भूषण, पद्म श्री, रत्न और जाने क्या-क्या। लेकिन चंद्रसिंह गढ़वाली के नाम कोई सम्मान नहीं। बदनसीबी से हमारे नेताओं का इस तरफ ध्यान नहीं जाता। पेशावर में यह जो कांड हुआ, उस पर गांधी जी का इंटरव्यू लंदन के एक अखबार में छपा। जब उनसे पूछा गया कि चंद्रसिंह गढ़वाली ने गोली चलाने से जो इनकार किया, उस पर उनकी क्या राय है, तो आप हैरान होंगे यह जानकर कि गांधी जी का जवाब था कि उसे अपनी ड्यूटी करनी चाहिए थी। 

इन घटनाओं का जिक्र मैं आजादी के आंदोलन के दौरान हिंदुस्तानी जनता का जो जज्बा था और नेताओं का जो रवैया था, वह बताने के लिए कर रहा हूँ। 

रायल इंडियन नेवी में जो बगावत हुई, उसे भी कांग्रेस हो या मुस्लिम लीग, दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं ने, आम जनता ने, खुलकर समर्थन दिया, अपना खून बहाया, लेकिन नेताओं ने उस बगावत का समर्थन नहीं किया। सवाल उठता है कि ऐसा क्यों? ऐसा इसलिए कि नेवी की बगावत हो या दूसरे आंदोलन--यह सब एक राष्ट्रीय संघर्ष तो था ही, लेकिन साथ-साथ वर्ग-संघर्ष भी था। दोनों का मिश्रण था हमारी आजादी की लड़ाई में। अलग-अलग जगहों पर हो रहे इन आंदोलनों की बागडोर कामगार वर्ग के हाथों में जा रही थी। कम्युनिस्ट ताकतों के हाथ में जा रही थी। और हो सकता था कि इंकलाब आ जाता। भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की शहादत को जनता भूल नहीं सकती थी। मुझे याद है, जिस दिन भगत सिंह को फाँसी दी गयी, पेशावर में पठान फूट-फूटकर रो रहे थे और मैं बयान नहीं कर सकता कि कैसा रोष और गुस्सा था वह। 

तो मैं कह रहा था कि अगर बागडोर कामगार वर्ग के हाथों में आ जाती, तो इंकलाब हो जाता। उस इंकलाब में आजादी का मतलब था कामगार वर्ग की आजादी। तो जाहिर है, मुख्य पार्टियों की लीडरशिप तो कामगार वर्ग की थी नहीं। वह थी उच्च वर्ग और मध्य वर्ग की। इसलिए ऐसे आंदोलनों के लिए उनकी ‘लिप सिंपैथी’ तो थी, जो उनकी मजबूरी थी, लेकिन असल में समर्थन नहीं था। इस तरह उनका दोगला चरित्र था। नेवी में हिंदुस्तानी जहाजियों ने जो बगावत की, उसके साथ भी यही हुआ। न कांग्रेस, न लीग की लीडरशिप ने उसे समर्थन दिया। और अंग्रेजों ने बेरहमी से बगावत को कुचल दिया। 

हम जानते हैं कि आजादी के बाद भी उन जहाजियों को, जिन्होंने बगावत में हिस्सा लिया था, वापस नेवी में नहीं लिया गया। आजाद हिंद फौज के जवानों को भी भारतीय सेना में वापस नहीं लिया गया। विडंबना देखिए कि नेवी के सेलर्स को तो स्वतंत्रता सेनानियों का दरजा तक नहीं मिला, जबकि नेवी में हुई बगावत के कारण ही अंग्रेजों को लगा कि अब वे हिंदुस्तान में नहीं टिक पायेंगे और आजादी दिलवाने में इस बगावत का बहुत बड़ा योगदान रहा। 

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सोमवार, 17 मई 2010

गांधी का स्वराज ज्यादा ठगों के बीच कम ठगों का स्वराज है


एक और अनेक, यानी व्यक्ति और जगत, या आत्मा और पदार्थ- की भारतीय प्राचीन मनीषियों की व्याख्या वाला जीवन दर्शन गांधी को जिस दृष्टा की ओर बढ़ाता है उसमें निष्काम कर्म की अवधारणा उनके मानस का प्रतिबिम्ब बनकर ही ''स्वराज" के रूप में प्रकट होती है। गांधी के विचारों का उत्स यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय ईशावास्योपनिषद से होता हुआ अपने विकास और विस्तार में दिखाई देती गीता के दर्शन का ही पुनर्पाठ है। कोई भिन्नता है भी तो यही कि गांधी एक ही साथ पदार्थ और आत्मा की यकीनी पर दृढ़ दिखाई देते हैं। विज्ञानसम्मत व्याख्याओं से पदार्थ की जटिल बुनावट को समझने वाली अवधारणा जो अणु, परमाणु और न्यूट्रान, इलैक्ट्रान जैसी सूक्ष्मता को परिभाषित करने में सक्षम है, गांधी उस पर केन्द्रित दिखाई नहीं देते। बल्कि उससे परहेज करते हैं। इस परहेज या इंकार के बिन्दु आस्तिक और नास्तिक के रूप में प्रकट होते हैं। विज्ञानवादी व्याख्याओं को नास्तिक मानने की जिद गांधी के भीतर इतनी दृढ़ है कि गांधी का स्वराज जो अपनी अवधारणा में जहां एक ओर साम्यवादी समाज व्यवस्था के स्वरूप को ग्रहण करता है वहीं आध्यात्मिकता की अवधारणाओं से समृद्ध-प्रत्येक मनुष्य को अपने कर्तव्यबोध में स्वत: बांधने वाली सत्ता-ईश के कारण, एक यूटोपिया में बदल जाता है। प्रकृति की घटनाओं को कार्यकारण संबंध से परिभाषित करने की बजाय गांधी उसके नियंत्रण और क्रियान्वयन को उसी ईश के द्वारा निर्धारित मानने की जिद के साथ दिखाई देते हैं। राजनैतिक गुलामी के बरक्स आध्यात्मिक गुलामी के विरोध में फूटे भारतीय पुनर्जागरण का प्रभाव गांधी को महात्मा में बदल देता है। पाप कर्म से मुक्ति ही गांधी का स्वराज है। वे स्वीकारते हैं कि जब तक इस तरह की मुक्ति प्राप्त नहीं होती तब तक अशान्ति ही मुझे प्रिय रहेगी। स्वंय को आधुनिक, न्यायप्रिय, ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ मानने वाले योरोपिय विचार ने तमाम उपनिवेशों के जनमानस को जाहिल और असभ्य माना, इसमें कोई दो राय नहीं। धार्मिक सर्वोच्चता और सांस्कृतिक उत्कृष्टता के झूठे दंभ ने उन्हें उपनिवेशों की स्थानीय सभ्यता और संस्कृति को भी जाहिल समझा, कोई असहमति नहीं। लेकिन उनके लूट-तंत्र वाले शासन जो राजनैतिक गुलामी की ओर धकेलने वाला रहा, की मुखालफत को धार्मिक और सांस्कृतिक श्रेष्ठता से एक मुकाम तक पहुंचाया जा सकता था, इसमें एतराज है। भारतीय पुनर्जारण में यह विचार एक मुख्य कारक रहा। भारतीय धर्म और संस्कृति की सर्वोच्चता को स्थापित करने के वास्ते ही गांधी भी उन्हीं पुनर्जागरणीय तत्वों से निष्काम कर्म की अवधारणाओं वाले गीता के अनुयायी बने रहते हैं। हां, गाधी की खूबी इस बात में है कि पुनर्जागरण के दूसरे महात्माओं की तरह जो आध्यात्मिकता की चरम ऊंचाईयों को पाने के लिए समाज से तटस्थता बनाते हुए गुफा, कंदराओं में दुबक जाने की आत्मकेन्द्रित मानसिकता के हिमायती रहे, वे उस परम ईश्वर की प्राप्ति के लिए जन के बीच गए। जीवन की हलचल में शामिल तमाम चर और अचर में उन्होंने उस ईश की उपस्थिति को महसूस किया और सम्पूर्ण जनमानस को भी वैसा ही व्यवहार करने के लिए प्रेरित करने के वास्ते खुद को नैतिक और दृढ़ बना कर उन सिद्धांतों को अमल में लाने की एक ऐसी कोशिश की जो सोचने को मजबूर करती है कि गांधी जिन मूल्यों और स्थापनाओं पर यकीन करते थे और जिसके लिए वे जिद की हद तक प्रत्यनशील थे क्या वे आज के इस दौर को परिभाषित करने में प्रासंगिक हैं या उनकी प्रासंगिकता का सवाल उठाना ही नहीं चाहिए। गांधी के यहां एक ही सवाल पर समय विशेष के हिसाब से आने वाले तर्कों का गांधी के आदर्शों से क्या लेना देना है, यह सवाल भी महत्वपूर्ण है। गांधी जहां एक ही वक्त में पूंजीवाद के उभार के बाद आए लोकतांत्रिक अधिकारों की बात करते हुए दिखाई देते हैं वहीं दूसरे ही क्षण कानून के राज से उनकी असहमतियां जिस पुराकालीन सामंती व्यवस्था के साथ दिखाई देने लगती हैं, उनका राज क्या है ? खुद चरखे और चश्में रूपी यंत्रों का इस्तेमाल करने वाले गांधी मशीनों के विरूद्ध दिखाई देने लगते हैं, यह मत भिन्नता भर है या इसके पीछे कोई सचमुच ऐसा तर्क है जो वर्तमान साम्राज्यवादी मूल्यों की स्थापनाओं में जुटी उपभोक्ता संस्कृतिक की मुखालफत का आधार बन सकता है ? किसी एक मुद्दे पर गांधी यदि बहुत प्रगतिशील दिख रहे हों तो जरूरी नहीं कि उसी मुद्दे पर कहीं दूसरी जगह गांधी को ऐसे तर्कों के साथ भी देखा न जा सकता हो जिसे घ्ाोर दक्षिणपंथी न भी कहा जाए तो उसे प्रगतिशील तो नहीं ही माना जा सकता।

एक ही विषय पर गांधी के विचारों की मतभिन्नता कोई सुस्पष्ट संकेत करने की बजाय बेहद जटिल मानस वाले गांधी का चित्र प्रस्तुत करती है। ''हिन्द स्वराज" को पढ़ने के बाद तो यह कहना ही पड़ रहा है कि गांधी को किसी एक बात के लिए अपने पक्ष या विपक्ष में कोट करना एक जोखिम को उठाना ही है। हिन्द स्वराज सभ्यताओं के संघर्ष की कथा कहते हुए पूंजीवादी सभ्यता के दुर्गणों को उसके शोषणकारी रूप में पाते हुए समाज के विकास में उसे पूरी तरह अक्षम पाता है लेकिन औद्योगिकरण की मुखालफत करते हुए एक अदृश्य आवेग में किसी अनजानी सभ्यता को स्मृतियों में दबाए चलता है। हिन्दुस्तानी सभ्यता का वह न जाने कौन सा चेहरा है जिस पर हिन्द स्वराज केन्द्रित है, उसका ठीक-ठीक अंदाज नहीं लगता। हां एक असंतोष है जो वर्तमान (उस समय भी) स्थितियों को अस्वीकार की दृष्टि से देखता है। यह असंतोष उस सभ्यता से भी है जो सामंती वर्चस्व के लिए ब्रिटिश सेना की मद्द लेने को आमादा थी। लेकिन उसे सामंती ढांचे में विस्तारवादी नीति के हिसाब से व्याख्यायित करने की बजाय धर्म आधारित सामाजिक बंटवारे को उनके बीच के मतभेद के रूप में गुलामी का कारण मानता है -

'' उस वक्त हिन्दू-मुसलमानों के बीच बैर था। कम्पनी को उससे मौका मिला। इस तरह हमने कम्पनी के लिए ऐसे संजोग पैदा किये, जिससे हिन्दुस्तान पर उसका अधिकार हो जाए। "

इतिहास की यह व्याख्या तो उन तथ्यों पर भी खरी नहीं उतरती जब मुसलमान शासकों के बीच ही आपसी सिर-फुटोवल थी तो फिर इसे उस युद्ध से ही कैसे सिद्ध किया जाए जो सम्पूर्ण भारत पर ब्रिटिशों के कब्जे का सबसे आखिरी युद्ध ही कहा सकता है- 1815 का खलंगा का युद्ध। देहरादून स्थित खलंगा के किले पर जो युद्ध लड़ा गया वह तो एक ओर गढ़वाल के चंद राजा और दूसरी ओर उस गोरखा सेना के साथ लड़ा गया जो अभी हाल-हाल तक भी नेपाल को हिन्दू राष्ट्र बनाए रहा। न तो खलंगा का युद्ध हिन्दू मुस्लिम शासकों के बीच का युद्ध था जिसमें अंग्रेजों ने अपनी सेना को भाड़े पर एक पक्ष के साथ लड़ने में मद्द की और न ही पश्चिम भारत और अन्य भारत के बहुत से रजवाड़ों के बीच की लड़ाइयां हिन्दू-मुस्लिम बंटवारे की वजह रही। तिब्बत के व्यापारिक मार्ग पर कब्जा और राज्य विस्तार की सामंती समझ ने हिन्दू धर्मावलम्बी, नेपाली-गोरखा फौज को 1790 में कुमांऊ और 1803 में गढ़वाल पर कब्जा करने को उकसाया। बिना इस बात की परवाह किए कि गोरखा फौज हिन्दू धर्मावलम्बी है, गढ़वाल के तत्कालीन शासक सुदर्शन शाह ने अंग्रेजों से गोरखा फौज के विरुद्ध मद्द ली। अंग्रेज चालाक थे। तिब्बत की पश्मिना ऊन और कस्तूरी उनकी भी आंखों में धंसी हुई थी। अपने व्यपार को सुचारु रूप से चलाने और मुनाफे पर पूरा नियंत्रण कायम करने के लिए जिस सैन्यबल की जरूरत थी, उसे वे जुटाते गए थे और जुटाई गई फौज केे दम पर सहयोगी बनकर ही वे सम्पूर्ण भारत को धीरे-धीरे अपने कब्जे में करते गए। लेकिन धर्म आधारित नैतिक आदर्शो की समझ के चलते गांधी ऐतिहासिक तथ्यों से परहेज करते हुए भारतीय गुलामी की जो व्याख्या करते हैं वे अतार्किक हो जाती है। इतिहास की सही समझ ही भविष्य के सपनों को आकार देने और उनके फलीभूत होने की समझ दे सकती है, इससे कोई इंकार कर सकता है क्या ? लेकिन हिन्द स्वराज के मार्फत इस सवाल का जवाब पाना असंभव ही बना रहता है। यह अलग बात है कि अन्य स्रोतों से भी गांधी से साक्षात्कार करने के बाद पूरी तरह से ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि भारत के जनमानस की गुलामी के लिए गांधी सिर्फ और सिर्फ धर्म आधारित व्याख्या को ही प्रमुख मानते हों। व्यापारिक हितों के लिए दुनिया पर कब्जा करने की अंग्रेजी मानसिकता का ज्ञान भी उनके यहां ढेरों स्रोतों में परिलक्षित होता है। पर वे सभी तर्क तो गांधी उस खास स्थिति को व्याख्यायित करने लिए ही दे रहे होते है जिनका जवाब ईश्वरिय व्यवस्था की स्थापना वाले सिद्धांतों के आधार पर देना संभव न हो पा रहा होता है।

दरअसल गांधी का स्वराज ज्यादा ठगों के बीच कम ठगों का स्वराज है और इन कम ठगों के प्रति नफरत के दम पर नहीं बस खुद को उसी ईश की सत्ता के अधीन मानते हुए ही मुखालफत का अहिंसक विरोध जो नैतिक दृढ़ता पर खड़ा हो, वे उसी की हिमायत करते चलते हैं।

''आप धर्म पर गलत आरोप लगाते हैं। पाखंड तो सब धर्मों में है। जहां सूरज है वहां अंधेरा रहता ही है। परछाई हर एक चीज को साथ जुड़ी रहती है। धार्मिक ठगों को आप दुनियावी ठगों से अच्छे पाएंगे। सभ्यता में जो पाखंड हैं, मैं आपको बता चुका हूं, वैसा पाखंड धर्म में मैंने कभी नहीं देखा।"

अहिंसा गांधी का धर्म नहीं, बल्कि उस धर्म को स्थापित करने की रणनीति है जो मानवीय समाज को नैतिक आदर्शों से विकसित होते हुए एक ईश की सत्ता मानने को प्रेरित करने वाली है - उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व में उस ईश के प्रति प्रेम और दृढ़ता इसी लिए कई बार बहुत नादान सी दिखाई देती है तो कई बार उसे चालाकी माना जा रहा होता है। लेकिन स्पष्टत: देखा जा सकता है कि भारत की गुलाम जनता की मुक्ति के लिए गांधी असंतोष फैलाने में यकीन करते थे, जो उनका सकारात्मक पक्ष भी है। अशान्ति के स्वरूप पर की गई उनकी व्याख्या यहां उल्लेखनीय है-
''अशान्ति असल में असंतोष है। उसे आजकल हम 'अनरेस्ट" कहते हैं। कांग्रेस के जमाने में वह 'डिस्कंटेंट" कहलाता था। मि0 ह्यूम हमेशा कहते थे कि हिन्दुस्तान में असंतोष फैलाने की जरूरत है। यह असंतोष बहुत उपयोगी चीज है। जब तक आदमी अपनी चालू हालत में खुश रहता है, तब तक उसमें से निकलने के लिए उसे समझाना मुश्किल है। इसलिए हर एक सुधार के पहले असंतोष ही होना चाहिए। चालू चीज से ऊब जाने पर ही उसे फेंक देने को मन करता है।"

हिन्द स्वराज सामाजिक सरोकारों से भरे करमचंद गांधी की ऐसी पुस्तक है जिसमें भविष्य के गांधी की दृढ़ताएं ज्यादा व्यवहारिक होकर दिखाई देती हैं। आरम्भिक दृष्टिकोण भी दक्षिण अफ्रिका में किए जा चुके प्रयोगों के अनुभवों का सैद्धान्तिकरण है। गांधी की व्याख्या उनके द्वारा की गई कार्रवाइयों को राजनैतिक मानकर की जाएगी तो निश्चित ही गड़बड़ पैदा होगी। मामला सहमति या असहमति का नहीं है। बल्कि तर्कपूर्ण रहते हुए तो असहमति ही ज्यादा उभरेंगी। क्योंकि राजनैतिक अर्थों में ही नहीं गैर-राजनैतिक अर्थों में भी गांधी अराजकता की हद तक कुतर्की नजर आते हैं। लेकिन उन कुतर्कों के पीछे जो मूल भावना है, जिसमें स्वराज की कल्पना साकार होती है, तो कुतर्क करता हुआ गांधी प्रिय भी लगता है। ईमानदारी, कर्तव्यबोध और नैतिक साहस को जुटा कर अन्याय का विरोध करने की ताकत का मूल भाव गांधी के जिस स्वराज की कल्पना करता है, उसके प्रति आम जन की सहज स्वीकार्यता ने ही गांधी को एक सामान्य मनुष्य से उस महात्मा तक पहुंचाया है जिसके लिए कवियों और मनीषियों को कहना पड़ा- चल पड़े जिधर दो पग, कोटी पग उसी ओर।

वर्तमान सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक परिस्थितियों का अध्ययन किसी को भी न तो गांधी से पूरा सहमत होने की स्थितियां पैदा करता है और न ही गांधी से पूरी तरह से असहमत हो कर किनारा करने देता है। किसी भी मुद्दे पर गांधी की व्याख्यायें यूं तर्क के आधार पर असहमति के ही द्वार खोलती है। यानी सहमति कम असहमति ही ज्यादा होती है। असहमतियों के आधार तार्किक होते हैं और सहमतियां गांधी के व्यवहार और दृढ़ता से। हिन्द स्वराज को पढ़ने के बाद तो असहमतियां और प्रबल हुईं हैं लेकिन असहमतियों के आधार पर गांधी के भीतर मौजूद अतार्किकता को देख पाने और सहमति के दरवाजों को खोल कर भीतर घुस पाने की कुंजी भी हासिल की जा सकती है। सहमतियों तक पहुंचने पर असहमतियां उतनी बिखरी-बिखरी भी नहीं रह पाती हैं, कुछ व्यवस्थित खांचों में दिखाई देती हैं। सहमतियों के वे बिन्दू समकालीन राजनीति की भ्रष्टता और लम्पटता को ज्यादा करीब से देखने का अवसर भी देते हैं। पर समग्रता में गांधी को किसी भी एक सवाल पर उर्द्धत करना ऐसे जोखिम को ही उठाना है जिसमें बदलावों के गैर-गांधीयन तरह से जारी संघर्षों से असहमत होना पहली शर्त हो जाता है, जबकि यह अपने आप में सच है कि अन्याय और अत्याचार के मजबूत और ताकतवर शासन के विरुद्ध गांधी के स्वराज को पाने के लिए भी गांधीयन तरह से जारी संघर्षों पर भी सत्ता की निर्ममता को आए दिन देख रहे होते हैं। स्पष्ट है कि गांधी के मुकाम, स्वराज की कल्पना भी संघर्ष के गांधीयन रास्ते से असंभव ही बनी रहने वाली है। समाज के बदलावों को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देख और जानकर ही किसी आंदोलन के स्वरूप और संघर्ष की रणनीति पर बात की जा सकती है। गांधी के यहां आंदोलन का मतलब जिस दार्शनिक सत्य को प्राप्त करना है वह समाज विकास के ऐतिहासिक चरणों वाली वैज्ञानिक व्याख्या को स्वीकार न करना ही नहीं बल्कि उसका अतार्किक विरोध ही ज्यादा है।

''हर नश्वर पदार्थ में ईश भरा है, ऐसा समझकर उसमें रस लिया, तो वही पदार्थ अमृत बना रहेगा। जिन-जिन पदार्थों का तू पदार्थ की तरह से, उनका रस त्यागकर, और उनमें निवास करने वाले ईश के रस पान का आस्वादन कर। ईश से मिलना सीख।" ईशावास्योपनिषद पर गुजराती लेखक उमा शंकर जोशी की यह व्याख्या गांधी के उस मानस को समझने में मद्दगार है जिसमें सम्पूर्ण जीव जगत ही नहीं बल्कि तमाम उपभोग की वस्तुओं से भी गांधी के लगाव और दूरियों को समझा जा सकता है। गांधी का यह ईश ही तमाम उपभोक्तावादी वस्तुओं में है, जीवन के कार्य-व्यापार में है और यहां तक कि शिक्षा ग्रहण करने और दूसरों को शिक्षित करने में भी है। वह राज-काज में भी है तो कानून और न्याय प्रणाली में भी मौजूद है। इसीलिए आकारहीन है। वह न तो किसी एक आकार को पूरी तरह से स्वीकारने के साथ है न उससे पूर्व के आकार को पूरी तरह से नकारने के साथ। इसीलिए कई बार वह घोर दक्षिणपंथि दिखाई देते हैं तो कई बार बहुत आधुनिक। वासना रहित, भोग लोभवृत्ति रहित, निष्काम भाव से कर्म करते हुए जगत की समस्त वस्तुओं में ईश्वर की कामना ही गांधी का स्वराज है। अपने पाठक से तर्क करते हुए गांधी का पात्र-सम्पादक स्पष्ट रूप से ईश की प्राप्ति को ही अन्तिम सत्य के रूप्ा में रखता है। वस्तुओं के परिग्रह की वृत्ति ऐसे ही ढीली पड़ेगी, मानता है। गीधवृत्ति नहीं रहेगी, फिर वस्तुओं के लिए, धन के लिए भागदौड़ कहां रह जाएगी ? इसी को परिभाषित करता है। त्यागपूर्वक भोग करते हुए ही सृष्टि के स्वामी ईश को पाया जा सकता है, व्याख्यायित करता है। वासना और लोभवृत्ति से प्रेरित कार्य गांधी के यहां पाप का पर्याय है। अपनी आत्मकथा सत्य के साथ मेरे प्रयोग में वे स्वीकारते हैं कि जब तक पाप कर्म से मुक्ति प्राप्त नहीं होती तब तक अशान्ति मुझे प्रिय रहेगी। पाप कर्म से मुक्ति ही गांधी का स्वराज है।

निष्काम कर्म के गूढ़ ज्ञान से भरी गीता-ईशावास्योपनिषद गांधी की प्रिय पुस्तक है। निष्काम कर्म के दर्शनों से भरा ईशावास्योपनिषद का विस्तार ही गीता का सार तत्व है। उमा शंकर जोशी द्वारा लिखी ईशावास्योपनिषद की व्याख्याओं को पढ़ते हुए गांधी आश्चर्यजनक रूप से याद आने लगते हैं। गांधी की पुस्तक ''हिन्द स्वराज" वैसे ही सवालों, जो उपनिषद में ऋषि द्वारा साधक को संबोधित हैं या गीता में कृष्ण द्वारा अर्जुन को संबोधित है, को एक सम्पादक द्वारा अपने पाठक को दिए जा रहे जवाब हैं। उन्हीं सवालों की व्यवाहारिक व्याख्या गांधी के यहां स्वराज की अवधारणा बनती है। करमचंद गांधी के महात्मा गांधी बनने का दर्शन उसी सार और उसके लिए नैतिक दृढ़ता में निहित है।

''आपत्ति-काल में मनुष्य को जो वस्तु बचाती है, उसका उस समय उसे भान न होता है, न ज्ञान। नास्तिक बच जाने पर कहता है कि मैं संयोगवश बच गया। आस्तिक ऐसे अवसर पर कहेगा कि मुझे ईश्वर ने बचाया। परिणाम के उपरांत वह यह अनुमान कर लेगा कि धर्मों के अभ्यास से, संयम से ईश्वर उसके हृदय में प्रकट होता है। ऐसा मानने का उसे अधिकार है, पर बचते समय वह नहीं जानता कि उसे उसका संयम बचाता है या कौन बचाता है।" सत्य के साथ मेरे प्रयोग।

धर्म और ईश्वर गांधी के यहां एक दूसरे के प्ार्याय हैं। ईश्वर ही धर्म है और धर्म पर यकीन ही ईश्वर पर यकीन है।

''मैंने देखा है कि जब सारी आशा जवाब दे देती है, कुछ करते-धरते नहीं बनता, तब कहीं न कहीं से मदद आ पहुंचती है। स्तुति, उपासना, प्रार्थना ये वहम नहीं हैं, बल्कि हमारा खाना-पीना, चलना-बैठना, आदि जितना सत्य है उसमें भी ये चीजें अधिक सत्य हैं। यह कहने में अतिश्योक्ति नहीं कि यही सत्य है, और सब मिथ्या है।''
''हिन्द स्वराज" के मार्फत यदि समकालीन भारतीय राजनीति का विश्लेषण करते हुए गांधी को समझना चाहे तो सबसे पहले उन सक्रिय भारतीय राजनैतिक धाराओं को पहचानना जरूरी है जो समाज व्यवस्था के वर्तमान स्वरूप्ा को अपने-अपने तरह से व्याख्यायित कर रही है। दरअसल समाज को देखने की यह भिन्नता ही सामाजिक बदलाव की राह को तय करने का रास्ता है और उस रास्ते में विभेद के चलते ही जन के बीच एकता की दीवार भी डगमगाती हुई होती है। पूंजीवादी लोकतंत्र पर यकीन और खुशहाली की शासकीय भाषा बोलने वाली राजनीति के लिए इस तरह के समाजिक विश्लेषण की शायद ही कोई उपयोगिता बची हो। वहां तो सांख्यिकी आंकड़ों वाला वह विश्लेषण ही काफी है जिसमें सकल घरेलू उत्पाद की भाषा में और विदेशी पूंजी निवेश की शब्दावली में जो कुछ भी है उसके मायने एकदम स्पष्ट है कि विरोध की कोई भाषा आतंकवादी कार्रवाई है। विरोध में उठने वाले जनआंदोलन के पक्ष में होना आतंकवाद को प्रश्रय देना ही है। जातीय, क्षेत्रीय, धार्मिक और भाषायी विभेद पैदा करने वाली किसी भी कार्रवाई से यहां स्पष्टतौर पर मतभेद रखते हुए सिर्फ और सिर्फ मनुष्यता की खुशहाली का सपने संजोए होने वाली लामबंदियों का ही पक्ष है। स्पष्ट है कि मुसीबतों की मार झेलते परेशान लोगों को सकारात्मक कार्रवाईयों के लिए एकजुट होते देख उनमें विभेद पैदा करने में ऐसी संकीर्ण कार्रवाईयां ही शासक वर्ग का हथियार होती रही हैं। यथास्थितिवाद को कायम रखने वाली ऐसी मानसिकता में गांधी का महिमामण्डन सबसे सरल और कर्मकाण्डीय ही है। साल के कुछ दिनों को श्राद्धपक्ष की तरह मनाते हुए गांधीयन विचार धारा के पुरोहितों को भी धन्य कर देने वाली व्यवस्था का रुप हिन्द स्वराज की प्रसंगिकता पर सेमीनार और व्याख्यानों की श्रृखंला खड़ा कर देने वाला है। इस रूप में गांधी की प्रासंगिकता व्यवस्था में स्पष्ट बनी हुई है। दूसरे स्तर पर वे वैचारिक कार्रवाईयां है जिनमें सामाजिक बदलाव की तीव्र आकांक्षा है और जो भारतीय सामाजिक व्यवस्था को दुनिया में होने वाले बदलावों के साथ ही रेखांकित करने पर यकीन करती है। सामाजिक बदलाव के आंदोलन की रणनीति भी उन्हीं विश्लेषणों के आधार पर संभव है, ऐसा मानने वाली इन धाराओं में भी मतभेद तो हैं ही पर वे मतभेद भारतीय आजादी के बाद स्थापित होती गई व्यवस्था को अपने-अपने तरह से परिभाषित करने के कारण ही हैं। समाज के बदलाव के विभिन्न ऐतिहासिक चरणों में वहां कोई मतभेद नहीं जैसे कि गांधी के यहां दिखाई देते हैं। ऐसी धाराओं के लिए गांधी की रणनीति पूरी तरह से अप्रसांगिक ही हो जाती है। सामंतवाद के बरक्स पूंजीवाद, ऐसी धाराओं के आधार पर समाज के विकास में एक आगे बढ़ा हुआ कदम है। लिहाजा पूंजीवाद शोषण और समाज निर्माण में उसकी विसंगतियां, जो साम्राज्यवादी स्थितियों की ओर उन्मुख है के आधार पर यदि गांधी का विश्लेषण करें तो 'हिन्द स्वराज" का पाठ उनके लिए भी जरूरी हो जाता है।

सम्राज्यवादी शोषण के नतीजों और सामंती सरोकारों के विरूद्ध गांधी की प्रासंगिकता हिन्द स्वराज के मार्फत व्याख्यायित की जाए तो पाएंगे कि साम्राज्यवादी उपभोक्ता संस्कृति के विरूद्ध गांधी की नैतिकता, दृढ़ता और त्यागपूर्वक उपभोग करने की समझदारी जिस दृढ़ता की मांग करती है वह उल्लेखनीय है। लेकिन सामंती सरोकारों में पोषित संस्कृति की जड़ता के विरूद्ध गांधी का दया करूणा वाला पाठ, जिसमें व्यक्ति के बदलाव की प्रक्रिया मुख्य है, अधूरा ही नहीं बल्कि भ्रमित करता हुआ ही पाठ है। देख सकते हैं कि वैश्विक स्तर पर ही नहीं बल्कि भारतीय इतिहास के संदर्भ में भी सामंती जड़ता के अंधकारमय युग से मुक्ति की कोई भी पहल दया, करूणा से संभव न हुई है। उसके शोषणकारी और अमानवीय रूप की ही झलक ज्यादा तीव्र रही है। धर्मग्रंथों की अतार्किक व्याख्याओं और कर्मकाण्डों की अंधविश्वासी गतिविधियों में मानवीय गरिमा की स्थापना को गहरा आघात पहुंचाया गया है। इस निर्ममता के विरूद्ध गांधी की दया, करूणा वाली अवधारणा सामाजिक बदलाव की गतिविधियों में अपनी सीमा के साथ है। हां, खुद को वर्गच्यूत करने वाले गांधीयन आदर्शो को यदि स्वीकारा जाए तो गांधी की प्रासंगिकता को उनकी उल्लेखनीय खूबी के साथ स्वीकारा जा सकता है।
-विजय गौड़

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